मसूरी में 12 साल, 52 लाख और अधूरी सड़क, पार्क एस्टेट ट्रैक बना भ्रम का ट्रैक!



मसूरी में ₹52.17 लाख ट्रैकिंग का सपना आज भी धूल फांक रहा है। 2010 की बात करे तो भारत सरकार ने उत्तराखंड के पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एक शानदार योजना बनाई देहरादून पर्यटन सर्किट। इस योजना के तहत मसूरी की सबसे ऐतिहासिक और प्राकृतिक जगहों को जोड़ने वाला एक सुंदर ट्रैकिंग मार्ग बनाया जाना था। जिसके तहत मसूरी में हाथीपांव से विशिंग वेल से जॉर्ज एवरस्ट हाउस से पार्क एस्टेट तक करीब 1070 मीटर लंबाई का ट्रेक रूट बनाया जाना था जिसका अनुमनित बजट ₹52.17 लाख था। इस कार्य को करने के लिये उत्तर प्रदेश राज्य निर्माण निगम लिमिटेड (यूपीआरएनएन) को दिया गया था। बता दे कि ये सिर्फ़ एक ट्रैक नहीं था, यह एक ऐसे रास्ते की कल्पना थी कि पर्यटकों को रोमांच, इतिहास और प्रकृति के बीच से होकर ले जायेगा। लेकिन अफसोस… ये सपना आज भी अधूरा है। आरटीआई (सूचना के अधिकार) के ज़रिए जब इस परियोजना की असलियत सामने आई, तो स्थिति चौंकाने वाली थी। 2014 में ही उपयोगिता प्रमाण पत्र भेज दिया गया । यानी कागज़ों में ट्रैक बन चुका था। परन्तु जमीनी हकीकत में आज भी ट्रैक अधूरा, और लोग खुद जोखिम लेकर ट्रैक करते हैं। आरटीआई में मिले नक्शों से साफ है कि यह क्षेत्र सिर्फ पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि इतिहास का जीता-जागता हिस्सा है। जॉर्ज एवरस्ट हाउस भारत के पहले सर्वेयर जनरल का निवास, जहाँ से देश का मानचित्र बना। विशिंग वेल और पार्क एस्टेट घने जंगलों, घाटियों और हिमालयी दृश्यावली के साथ यह इलाका ईको-टूरिज्म का हॉटस्पॉट बन सकता था। लेकिन क्या हुआ? नक्शे तो बने… पर ट्रेक रूट नहीं। स्थानीय व्यवसायी, होटल मालिक और गाइड्स ने बताया कि 12 साल से हम इंतज़ार कर रहे हैं। हर बार सुनते हैं कि ट्रैक बन जाएगा, सुविधाएं आएंगी… लेकिन कुछ भी नही हो पाया। मसूरी आने वाले हजारों पर्यटक भी इस अधूरे ट्रैक से भ्रमित और परेशान होते हैं। बिना संकेतों और सुरक्षा के ट्रैकिंग करना कभी भी हादसे की वजह बन सकता है। बीते सालों में इस क्षेत्र के विकास को लेकर सफेद पोष लोगो ने क्षेत्र की जनता से कई वादे किये जिसमें रोपवे परियोजना, इको-ट्रेल डेवलपमें व पार्क एस्टेट में पर्यटक सुविधा केंद्र लेकिन व वादे वादे ही रह गए। लोग बताते है कि यह मामला सिर्फ एक अधूरी सड़क का नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की गहरी खामियों का प्रतीक बन गया है। उन्होने राज्य सरकार से मांग कि है ₹52.17 लाख के ट्रेक रूट योजना की जांच करने के साथ 2014 के उपयोगिता प्रमाण पत्र की जांच होनी चाहिए, पूरे ट्रैक को नए सिरे से डिज़ाइन और पुनः चालू किया जाना चाहिये वही जनता, प्रशासन और विशेषज्ञ मिलकर योजना को पुनर्जीवित कर डिजिटल ट्रैकिंग और निगरानी से निर्माण की पारदर्शिता की जाये।