प्राकृतिक खेती-जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग की ओर बढ़ता उत्तराखण्ड

श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखण्ड की धरती एक बार फिर अपने पारंपरिक स्वरूप की ओर लौटने को आतुर है। प्राकृतिक खेती यानी Zero Budget Natural Farming (ZBNF) जिसे पद्दमश्री सुभाष पालेकर ने सुझाया है यह शब्द अब केवल एक प्रयोग नहीं,बल्कि एक आंदोलन बनता जा रहा है। खासकर उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्य में जहां सीमित संसाधनों के साथ टिकाऊ खेती एक चुनौती है,वहां यह पद्धति उम्मीद की नई किरण बनकर उभरी है। इस विषय पर विस्तृत समझ के लिए हमने बात की कृषि एवं औद्यानिकी विशेषज्ञ डॉ.राजेन्द्र कुकसाल से,जो वर्षों से जैविक व प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में कार्यरत हैं। सवाल-डॉ.साहब सबसे पहले हम यह जानना चाहेंगे कि प्राकृतिक खेती और जैविक खेती में मूल अंतर क्या है। डॉ.राजेन्द्र कुकसाल-बहुत अच्छा सवाल है। रसायनिक खेती के मानव स्वास्थ्य,मिट्टी व पर्यावरण पर दुष्परिणामों को देखते हुए वैज्ञानिकों ने कृत्रिम रसायन मुक्त खेती अर्थात जैविक खेती/ प्राकृतिक खेती करने की सलाह किसानों को दी। जैविक खेती और प्राकृतिक खेती दोनों ही कृत्रिम/सेंथेटिक रसायन मुक्त खेती के तरीके हैं,लेकिन खेती की इन दोनों पद्धतियों में महत्वपूर्ण भिन्नताएं हैं। जैविक खेती और प्राकृतिक खेती में अक्सर लोग भ्रमित हो जाते हैं। जैविक खेती में रासायनिक खादों और कीटनाशकों की जगह गोबर खाद,वर्मीकम्पोस्ट,नीम तेल जैसे जैविक उत्पादों का प्रयोग होता है,लेकिन इसमें बाहरी इनपुट्स (input cost) की आवश्यकता बनी रहती है। किसान को खाद,कीटनाशक और बीज बाजार से खरीदने पड़ते हैं। वहीं प्राकृतिक खेती,विशेषकर जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (ZBNF),पूरी तरह स्थानीय संसाधनों पर आधारित है। इसमें गाय का गोबर,गौमूत्र,मिट्टी का जीवामृत,बीजामृत आदि से खेत को जीवित रखा जाता है। लागत लगभग शून्य होती है और उत्पादन भी पोषक तत्वों से भरपूर रहता है। सवाल-उत्तराखण्ड के भूगोल और जलवायु को देखते हुए,क्या यहां प्राकृतिक खेती की संभावनाएं हैं। डॉ.कुकसाल-उत्तराखण्ड में प्राकृतिक खेती की असीम संभावनाएं हैं। यहां की मिट्टी अभी भी ज़्यादा प्रदूषित नहीं हुई है,और जलवायु विविधता के कारण अलग-अलग फसलों की खेती संभव है। पर्वतीय क्षेत्रों में सीमित भूमि और पारंपरिक ज्ञान का समावेश प्राकृतिक खेती के लिए बेहद अनुकूल है। इसके अलावा,यहां के किसानों के पास गाय-बकरी जैसे पालतू पशु हैं जो प्राकृतिक खेती में मूल भूमिका निभाते हैं। यदि हम गांव-गांव में प्रशिक्षण और प्रोत्साहन दें,तो उत्तराखण्ड एक प्राकृतिक कृषि राज्य बन सकता है। सवाल-क्या प्राकृतिक खेती किसानों की आय बढ़ा सकती है,खासकर छोटे किसानों की। डॉ.कुकसाल-बिलकुल प्राकृतिक खेती में लागत शून्य होती है,जिससे लाभ अपने आप बढ़ता है। साथ ही उत्पादों की गुणवत्ता इतनी बेहतर होती है कि उन्हें अच्छे दामों में बेचा जा सकता है। यदि किसानों को सही मार्केटिंग और ब्रांडिंग का सहयोग मिले,तो छोटे किसान भी आर्थिक रूप से सशक्त बन सकते हैं। कम खर्च,अधिक मुनाफा और धरती को बचाने का उपाय,यही है प्राकृतिक खेती। सवाल-राज्य सरकार या केंद्र की योजनाएं किस प्रकार किसानों को मदद कर सकती हैं। डॉ.कुकसाल-नीति आयोग और केंद्र सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रहे हैं,जैसे कि भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति मिशन (BPKP)। उत्तराखण्ड सरकार को चाहिए कि वह इन योजनाओं को जमीनी स्तर पर पहुचाए। कृषि विभाग,उद्यान विभाग और एनजीओ को मिलकर प्रशिक्षण शिविर,डेमो फॉर्म और किसान मेलों के जरिए प्रचार करना होगा। युवाओं को जोड़ना भी जरूरी है ताकि वह खेती को लाभकारी उद्यम समझें। सवाल-आप युवा किसानों को क्या संदेश देना चाहेंगे-डॉ.कुकसाल मैं यही कहूंगा कि आज की जरूरत है प्रकृति के साथ चलने की। आधुनिकता जरूरी है,लेकिन जड़ों को पकड़ कर आगे बढ़ना और मिट्टी से प्रेम करना ज्यादा जरूरी है। प्राकृतिक खेती एक ऐसी राह है जहां धरती,शरीर और जेब तीनों स्वस्थ रहते हैं। निष्कर्ष-डॉ.कुकसाल के अनुभवों और सुझावों से स्पष्ट है कि यदि उत्तराखण्ड जैसे राज्य प्राकृतिक खेती को मिशन के रूप में अपनाएं,तो यह खेती के साथ-साथ किसानों की तकदीर भी बदल सकती है। यह केवल एक कृषि पद्धति नहीं,बल्कि सस्टेनेबल जीवनशैली की ओर लौटने की कोशिश है।