जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिंग का कृषि पर प्रभाव–डॉ.राजेंद्र कुकसालकृषि एवं उद्यान विशेषज्ञ

श्रीनगर गढ़वाल। जलवायु परिवर्तन वह दीर्घकालिक प्रक्रिया है,जिसके अंतर्गत दशकों,सदियों या उससे अधिक समय में पृथ्वी की जलवायु में स्थायी परिवर्तन होते हैं। इसका प्रमुख कारण ग्लोबल वार्मिंग है,जो ग्रीनहाउस गैसों (CO₂, CH₄, NO2 आदि) की अत्यधिक मात्रा के कारण उत्पन्न होती है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण-जनसंख्या वृद्धि,शहरीकरण,औद्योगिकीकरण पेट्रोलियम ईंधनों का अत्यधिक उपयोग,वनों की कटाई,जंगलों में आग,कृषि में कृत्रिम रसायनों का अत्यधिक प्रयोग,इन सभी कारकों से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ा है,जिससे धरती का तापमान निरंतर बढ़ रहा है। प्रभाव की वैज्ञानिक पुष्टि IPCC (Intergovernmental Panel on Climate Change) संयुक्त राष्ट्र का एक वैज्ञानिक निकाय है,जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों व जोखिमों का मूल्यांकन करता है। हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के लक्षण वर्षा का समय व स्वरूप बदल गया है-अब कम अवधि में तीव्र वर्षा,बादल फटने,ओलावृष्टि व सूखे की घटनाएं बढ़ीं,बर्फबारी में कमी-हिमालयी ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं,जलस्रोतों का सूखना-जल उपलब्धता में गिरावट दिन व रात के तापमान में अत्यधिक अन्तर घना कोहरा व पाला-सामान्य घटनाएं बन गई हैं,कृषि पर प्रभाव फसल चक्र में अव्यवस्था-असमय वर्षा एवं तापमान वृद्धि के कारण बीज बोने और कटाई का समय प्रभावित हुआ है। बागवानी पर असर- उच्च चिलिंग घंटों की आवश्यकता वाली फलों की फसलें (जैसे सेब नाशपाती आड़ू प्लम खुबानी चेरी आदि) की किस्में कम हो रही हैं। चिलिंग आवर्स पूरे न होने के कारण सुप्त अवस्था टूटने में देरी से फलों के उत्पादन व गुणवत्ता में कमी आई है। उत्पादकता में गिरावट-जैसे मटर,आलू,टमाटर आदि फसलें तापमान असंतुलन व वर्षा की अनिश्चितता के कारण गलकर नष्ट हो रही हैं। मिट्टी की उर्वरता पर असर-भूमि कटाव,जैविक कार्बन की कमी और ऊपरी उपजाऊ मिट्टी के क्षरण से मृदा की गुणवत्ता घट रही है। कीट एवं रोगों में वृद्धि-जलवायु में अचानक बदलाव से कीट-पतंगों व रोगजनकों का प्रकोप बढ़ गया है। उदाहरण स्वरूप,मिर्च,टमाटर,बैंगन में उकठा रोग (wilt) की समस्या बढ़ रही है। समाधान-कृषि विशेषज्ञों की दृष्टि से परम्परागत ज्ञान+वैज्ञानिक तकनीक-कृषि कार्यों में वैज्ञानिक उपायों के साथ पारंपरिक अनुभवों का भी समावेश आवश्यक है। जैविक एवं प्राकृतिक खेती-देशी/स्थानीय बीजों को बढ़ावा देना कम्पोस्ट,जीवामृत,वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग रासायनिक कीटनाशकों की बजाय जैविक उपाय अपनाना। इंटीग्रेटेड/समेकित खेती प्रणाली-एकल फसल के बजाय अंतर्वर्ती फसल पद्धति नगदी फसलों की खेती से साल भर आय सुनिश्चित करना। बीज बुवाई समय में रणनीतिक बदलाव-वर्षा एवं कीट-व्याधि के प्रकोप के आधार पर बीज बोने और पौधारोपण के समय का चयन,मोटे अनाजों को पुनर्जीवित करना-जैसे-ज्वार,बाजरा,रागी,मंडुवा,चीना आदि जो सूखा सहनशील,कम अवधि वाली और पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं। जल संरक्षण व मृदा नमी प्रबंधन-टपक सिंचाई प्रणाली-वर्षाजल संचयन मल्चिंग एवं ऐंटी-हेल नेट तकनीक का उपयोग,संरक्षित खेती (Protected Cultivation)-पॉलीहाउस,ग्रीनहाउस में सब्जियां,फूल व नर्सरी उगाना,प्रतिकूल मौसम,ओलावृष्टि व जंगली जानवरों से सुरक्षा। निष्कर्ष-जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है,यह एक कृषिक संकट भी है। इसके दुष्प्रभावों को कम करने हेतु अंतरराष्ट्रीय,राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। हमें परंपरागत भारतीय जीवनशैली और आधुनिक कृषि तकनीकों का समावेश कर टिकाऊ,पर्यावरण-अनुकूल और आत्मनिर्भर खेती प्रणाली की ओर बढ़ना होगा।