भारत की सनातन आत्मा का उदघोष संस्कृत-वेदों की वाणी,संस्कृति की धड़कन,भविष्य की प्रेरणा–शिक्षाविद्-कमल किशोर डुकलान

श्रीनगर गढ़वाल। विश्व संस्कृत दिवस 9 अगस्त को मनाया जाता है संस्कृतेन विना भारतं,भारतं न भवेत् कदा,संस्कृतो हि हृदि स्थित,धर्मस्य मूलकारणम्। संस्कृत के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती,यह धर्म और संस्कृति का मूल है। हर वर्ष श्रावण पूर्णिमा के पावन अवसर पर मनाया जाने वाला विश्व संस्कृत दिवस केवल एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं,बल्कि भारत की सनातन आत्मा की पुनः स्थापना का संकल्प है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि संस्कृत मात्र एक भाषा नहीं,बल्कि वेदों,उपनिषदों,पुराणों और शाश्वत ज्ञान-विज्ञान की अमर धरोहर है। संस्कृत वह देववाणी है,जिसने मानव सभ्यता को दर्शन,विज्ञान,गणित,चिकित्सा,कला,साहित्य और अध्यात्म का अद्वितीय खजाना दिया। सा विद्या या विमुक्तये-वह विद्या ही सच्ची है जो मुक्ति प्रदान करे। इतिहास और वैश्विक प्रभाव-संस्कृत का उद्भव लगभग 3,500 वर्ष पूर्व हुआ और यह प्राचीन काल में केवल भारत ही नहीं,बल्कि दक्षिण एशिया,दक्षिण-पूर्व एशिया,मध्य एशिया और पूर्वी एशिया तक शासन,दर्शन और साहित्य की अभिजात्य भाषा रही। वेद,वेदांग,ब्राह्मण,उपनिषद,स्मृति,पुराण,महाकाव्य,नाटक,अलंकार सभी का मूल आधार संस्कृत। भारतीय दर्शन,गणित,तंत्र,आयुर्वेद,राजनीति,खगोल,वनस्पति विज्ञान सभी में संस्कृत का अमूल्य योगदान। धर्मेण हीना,पशुभि समाना,धर्म से हीन मनुष्य पशु के समान है और धर्म का मूल संस्कृत शास्त्रों में है। संस्कृत का महत्व-अतीत से वर्तमान तक कणाद का परमाणुवाद,चरक-सुश्रुत का आयुर्वेद,पिंगल का छंदशास्त्र,पतंजलि का योगसूत्र,भास्कराचार्य और आर्यभट्ट का गणित एवं खगोल यह सब संस्कृत की कोख से जन्मी अमूल्य निधियां हैं। आज भी संस्कृत केवल मंदिरों और यज्ञों तक सीमित नहीं है,बल्कि विश्वभर के विश्वविद्यालयों जर्मनी,अमेरिका,रूस,स्विट्जरलैंड में पढ़ाई जा रही है। अमेरिका में तो संस्कृत का समर्पित विश्वविद्यालय भी स्थापित है। साहित्य और सांस्कृतिक सौंदर्य कालिदास,भवभूति,बाणभट्ट,आद्य शंकराचार्य,जयदेव,भारवि,भर्तृहरि,विष्णु शर्मा ये सभी संस्कृत साहित्य के महानायक हैं,जिन्होंने न केवल काव्य और नाटक,बल्कि मानवता,संस्कृति और आध्यात्मिकता को अमर कर दिया। वागर्थाविव संप्रुक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये,जगतः पितरौ वन्दे पार्वती-परमेश्वरौ। कालिदास जैसे वाणी और अर्थ एक-दूसरे से जुड़े हैं,वैसे ही पार्वती और परमेश्वर संसार के आधार हैं। संस्कृत का पुनरुद्धार-वर्तमान प्रयास उत्तराखंड ने संस्कृत को राजकीय भाषा का दर्जा दिया। संस्कृत भारती,विश्व संस्कृत संगठन,भारत सरकार की संस्कृत अकादमी और विभिन्न राज्य बोर्ड इसके प्रसार में लगे हैं। पाठ्यक्रम,प्रशिक्षण,अनुवाद,प्रकाशन,पुरस्कार और सम्मेलन के माध्यम से संस्कृत को शिक्षा की मुख्यधारा में लाया जा रहा है। भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती,तस्माद्धि का न साधुर्भाषा संस्कृता विना। सभी भाषाओं में मधुर और दिव्य भाषा संस्कृत है,इसके बिना कोई भी भाषा पूर्ण नहीं। भविष्य की भाषा-नई पीढ़ी का दायित्व संस्कृत को केवल एक विषय न मानकर दैनिक संवाद,शिक्षा,तकनीक और नवाचार का हिस्सा बनाना होगा। अगर हम संस्कृत को लोकभाषा के रूप में अपनाएं,तो यह भाषा फिर से भारत की सांस्कृतिक पहचान और बौद्धिक शक्ति का प्रतीक बन सकती है। संस्कृत की यात्रा-विचार,ज्ञान,कला,साहित्य,विज्ञान,अध्यात्म और दर्शन की एक सतत धारा है,जो भारत के अतीत,वर्तमान और भविष्य को जोड़ती है। जब हम इसे व्यवहार में अपनाएंगे,तब यह भाषा पुनः भारत की सनातन आत्मा का उदघोष बन जाएगी।