घंटियों की टन-टन बांसुरी की तान-देवभूमि के जंगलों में जिंदा है गोपाल परंपरा


श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड की देवभूमि के जंगलों में आज भी एक ऐसी परंपरा सांस ले रही है,जो केवल पशुपालन की गाथा नहीं कहती,बल्कि गांव के मेल-जोल,लोकसंगीत और साझा भोजन की सदियों पुरानी संस्कृति को भी सहेजती है। जनपद पौड़ी गढ़वाल के विकास खंड खिर्सू में स्थित ग्राम सरणा के गोपालक आज भी इस परंपरा को संजीवित रखे हुए हैं। यहां के गोपालक रोज सुबह आठ बजे गायों के साथ जंगल की ओर निकलते हैं और दोपहर एक बजे लौटते हैं। यह समय केवल चराई का नहीं,बल्कि प्रकृति की गोद में मिल-बांटकर जीवन जीने का एक उत्सव है। यहां बुजुर्ग कहते हैं-गौ सेवा ही परमो धर्म,और गौ रक्षा ही जीवन का सच्चा कर्म। गोवर्धन और गौ-लक्ष्य पर्वत की तलहटी में जब गायों का झुंड चरता है,तो उनके गलों में बंधी घंटियों की टन-टन जंगल की खामोशी को मधुर बना देती है। लगभग 60 वर्षीय गोपालक राम सिंह भंडारी ग्राम सरणा पुरानी यादों में मुस्कुराते हुए बताते हैं,जब हम 15-20 साल के थे,तो गांव के साथी घर से आलू,हरी पत्तियां,तेल,आटा,नमक और मसाले लेकर जंगल पहुंचते थे। वहां पकौड़ियां बनतीं,सब मिलकर खाते थे। कभी मोटी दाल और अनाज को साथ उबालकर नमक डालते और फिर चाव से उसका स्वाद लेते। राम सिंह आगे बताते हैं कुछ वर्ष पहले मनवर सिंह भंडारी अपनी बांसुरी की मधुर धुन से गोपालकों को नचा देते थे। कभी साथी ढोलक की थाप पर लोकगीत गाते,तो कभी जंगल की हवा में गीत गूंज उठते। वे एक दिन का मजेदार किस्सा सुनाते हैं-एक बार पकौड़ी बनाने गए,तो आटा कम पड़ गया। किसी ने मजाक में कहा-अरे आटा तो बिन बुलाए मेहमान की तरह है,जितना हो उतना ही चलेगा,फिर हमने पतली पकौड़ियां बनाई,और हंसी-मजाक में सबने पेट भर खा लिया। आज महिलाएं भी इस परंपरा में शामिल होती हैं। वे अपने साथ आम,आडू,मौसम के अनुसार फल और मायके से लाए रोट और अरसे लाती हैं। इन व्यंजनों के साथ लोकगीतों की आवाज पूरे जंगल में गूंजती है-छैंया रे छैंया,गौ-धन हमारी माई,गौ बिना सूना घर,पानी बिना काई। बकरीपालक महावीर सिंह भंडारी ग्राम सरणा अपनी खास परंपरा बताते हैं-जब जंगल में बकरियों में कोई नया बच्चा होता है,तो उसका प्रथम दूध तिमले के चौड़े पत्तों में निकालकर आग में पकाकर परोसते हैं। इसे गढ़वाली में लीसडू कहते हैं। इसका स्वाद और ताजगी आज भी भूल नहीं पाता। बरसात के दिनों की यादें भी कम रोमांचक नहीं। राम सिंह बताते हैं कि पहाड़ की बरसात अचानक आती थी आसमान काला पड़ता और मूसलधार बारिश शुरू हो जाती। हम झटपट चौड़े पत्तों को जोड़कर छतरी बना लेते और उसी के नीचे घर लौटते। बरसात थमने के बाद जंगल का नजारा अद्भुत हो जाता गीली मिट्टी की भीनी खुशबू,पत्तियों से टपकती बूंदें,और गाय-बकरियों के भीगे शरीर से आती मिट्टी और घास की गंध मन को ठंडक दे जाती। बरसात के बाद जंगल का स्वाद भी बदल जाता। पेड़ों की छांव में,गीली मिट्टी से झांकते सफेद और भूरे कुकुरमुत्ते गोपालक इन्हें सावधानी से तोड़ते,पत्तों में लपेटते और घर ले जाकर लकड़ी की आग पर भूनते। नमक-मिर्च छिड़कते ही उनका स्वाद ऐसा लगता मानो बरसात का पूरा मजा उनमें ही समा गया हो। स्थानीय लोग गर्व से कहते हैं-गौ धरम सबसे न्यारा,जिसे निभाए वो ही प्यारा,जितनी गो बछिया,उतनी घर की खुशियां। गौ बिन खेत सुनसान,दूध बिन रसोई वीरान। गौ पालन से मिलता पुण्य और गौ सेवा से मिलता सच्चा सुख। पुराने समय के पशुपालकों के गीत आज भी बुजुर्गों की जुबान पर हैं-घंटयों की टन-टन में,मन भी चरने जाय,बांसुरी की धुन सुन,थकान दूर भगाय। दूध की धारा बहे,खेत में हरियाली छाय,गौ-धन पालण से,सुख समृद्धि आय। गौ सेवा की आस्था से जुड़ी एक कथा-पौड़ी के एक बुजुर्ग बताते हैं कि बहुत साल पहले गांव में एक गरीब गौपालक था,जिसके पास केवल एक बूढ़ी गाय थी। वह रोज जंगल में उसे चराने ले जाता और दिनभर उसकी सेवा करता। एक बरसात की रात गाय जंगल में फंस गई। गौपालक ने बिना सोचे-समझे मूसलधार बारिश में उसे खोजा और अपनी पीठ पर उठाकर घर लाया। अगले दिन गांव के लोगों ने देखा कि वही बूढ़ी गाय मंदिर के दरवाजे पर खड़ी है और उसके सींगों पर फूलों की माला सजी है। कहते हैं,उस रात स्वयं भगवान कृष्ण ने उस गौपालक को दर्शन देकर आशीर्वाद दिया जिसने गौ की सेवा की उसने मेरे हृदय को प्रसन्न किया। तभी से गांव में यह कहावत प्रचलित है गौ सेवा ही गोविंद सेवा है।