कांसा और पितल देवभूमि उत्तराखंड का स्वास्थ्य मंत्र जो खोता जा रहा है चमक

श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड और देश के अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में एक समय ऐसा था जब हर घर की रसोई में कांसे और पितल के बर्तनों की खनखनाहट सुनाई देती थी। कांसे के थाल,कटोरियां,लोटे,पितल के लोढे,थालियां और गिलास ये सिर्फ बर्तन नहीं थे,बल्कि सेहत और परंपरा के प्रतीक थे। इसके अलावा पत्थर से बनी पारंपरिक कुण्डियां भी घर-घर में उपयोग होती थीं,जिनमें बना भोजन और रखा पानी स्वाद और पौष्टिकता दोनों में अद्वितीय होता था। कांसा जो तांबा और जस्ता का मिश्रण है,भोजन को शुद्ध,पौष्टिक और जीवाणुरहित बनाए रखने में सक्षम है। पितल,जिसमें तांबा और जस्ता होता है,पानी को ताजगी और प्राकृतिक खनिजों से भर देता है। आयुर्वेद में भी यह मान्यता है कि कांसा वात,पित्त और कफ का संतुलन बनाए रखता है,जबकि पितल शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता और पाचन शक्ति को मजबूत करता है। गढ़वाल के 85 वर्षीय बुजुर्ग भुवन सिंह रावत बताते हैं जब हम जवान थे,घर में कांसे के थाल में ही खाना मिलता था। पितल के लोढे से पानी पीने का स्वाद आज भी नहीं भूलता। खेतों में दिनभर काम करने के बाद भी थकान जल्दी मिट जाती थी। कुमाऊं क्षेत्र की शांति देवी याद करती हैं बचपन में अगर कोई कांसे का लोटा गिरा देता था तो मां डांट देती थी इसे संभाल कर रखो ये सोने से कम नहीं। आज के बच्चे एल्यूमिनियम और प्लास्टिक में पानी पीते हैं,उसमें वो ताजगी कहां,गढ़वाल और कुमाऊं के कारीगरों की विरासत-गढ़वाल और कुमाऊं के कई गांव कभी कांसा-पितल के बर्तन बनाने के लिए प्रसिद्ध थे। टिहरी,श्रीनगर,चंपावत,पिथौरागढ़,बागेश्वर और अल्मोड़ा जैसे क्षेत्रों में कारीगर पीढ़ियों से इस कला को संजोए हुए थे। सुबह-सुबह हथौड़ों की लयबद्ध चोट की आवाज गांव में गूंजती थी,जहां लोहार और ठटेरा परिवार तांबा-जस्ता गलाकर बर्तनों का निर्माण करते थे। ठटेरा समुदाय के बुजुर्ग गिरधारी लाल ठटेरा बताते हैं,पहले शादी-ब्याह,त्योहारों और पूजन में कांसा-पितल के बर्तन ही दिए जाते थे। लोग इसे शुभ मानते थे। हम महीनों पहले से काम में जुट जाते थे। लेकिन एल्यूमिनियम और स्टील के सस्ते विकल्पों ने इस कारीगरी को लगभग खत्म कर दिया। आज कुछ ही कारीगर बचे हैं,जो शौकिया या खास ऑर्डर पर कांसा-पितल के बर्तन बनाते हैं। यह न केवल रोजगार का संकट है,बल्कि एक प्राचीन शिल्पकला के विलुप्त होने का खतरा भी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार,एल्यूमिनियम के बर्तनों में लंबे समय तक भोजन करने से शरीर पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। ऐसे में जरूरी है कि देवभूमि उत्तराखंड और पहाड़ी क्षेत्रों के लोग अपनी पुरानी परंपरा की ओर लौटें और कांसे-पितल के बर्तनों का उपयोग फिर से शुरू करें। इससे न केवल सेहत सुधरेगी,बल्कि गढ़वाल और कुमाऊं के पारंपरिक कारीगरों की रोजी-रोटी भी बचेगी और हमारी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहेगी।