श्रीनगर गढ़वाल। समाज और जीवन के संतुलन का नाम ही धर्म है,भारतीय परंपरा में इसे मध्यम मार्ग कहा गया है। यही आज की दुनिया की सबसे बड़ी आवश्यकता भी है। आत्मनिर्भर भारत के लिए स्वदेशी को प्राथमिकता दें तथा भारत का अंतरराष्ट्रीय व्यापार केवल स्वेच्छा से अपनाएं,किसी दबाव में नहीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने कहा कि समाज और जीवन में संतुलन का ही धर्म है,जो किसी भी अतिवाद से बचाता है। भारतीय परंपरा इसे मध्यम मार्ग कहा गया है,वर्तमान समय में यहीं दुनिया की सबसे बड़ी आवश्यकता है। संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में विज्ञान भवन में आयोजित त्रिदिवसीय व्याख्यान में 100 वर्ष की संघ यात्रा-नए क्षितिज के दूसरे दिन संबोधित कर रहे थे। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि संघ का कार्य शुद्ध सात्त्विक प्रेम और समाज निष्ठा पर आधारित है,जिसमें संघ का स्वयंसेवक कोई व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा नहीं रखता। यहां इंसेंटिव नहीं हैं,बल्कि डिसइंसेंटिव अधिक हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जीवन की सार्थकता और मुक्ति की अनुभूति इसी सेवा से होती है। सज्जनों से मैत्री करना,दुष्टों की उपेक्षा करना,कोई अच्छा करता है तो आनंद प्रकट करना यही संघ का जीवन मूल्य है। संघ प्रमुख ने हिन्दुत्व की मूल भावना पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हिन्दुत्व सत्य,प्रेम और अपनापन है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हमें सिखाया कि जीवन अपने लिए बल्कि परमार्थ के लिए है। यही कारण है कि भारत को दुनिया में बड़े भाई की तरह मार्ग दिखाने की भूमिका निभानी है। इसी से विश्व कल्याण का विचार जन्म लेता है। संघ प्रमुख ने दुनिया में कट्टरता,कलह और अशांति पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले साढ़े तीन सौ वर्षों में उपभोगवादी और जड़वादी दृष्टि के कारण मानव जीवन की भद्रता क्षीण हुई है। उन्होंने गांधी जी के सिद्धांत पर आधारित सात सामाजिक पापों,काम बिना परिश्रम,आनंद बिना विवेक,ज्ञान बिना चरित्र,व्यापार बिना नैतिकता,विज्ञान बिना मानवता,धर्म बिना बलिदान और राजनीति बिना सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि इनसे समाज में असंतुलन ही गहराया है। दुनिया में समन्वय के अभाव में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि दुनिया को पूजा-पाठ और कर्मकांड से परे धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपना नजरिया बदलना होगा। सभी प्रकार के रिलिजन से ऊपर धर्म है। धर्म हमें संतुलन बनाना सिखाता है-हमें भी जीना है,समाज को भी जीना है और प्रकृति को भी जीना है। धर्म इसका एक मध्यम मार्ग है जो अतिवाद से बचाता है। धर्म हमें मर्यादा और संतुलन के साथ जीना सिखाता है। इसी दृष्टिकोण से विश्व शांति स्थापित हो सकती है। धर्म को परिभाषित करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि धर्म वह है जो हमें संतुलित जीवन की ओर ले जाए,जहां विविधता को स्वीकार किया जाता है और सभी के अस्तित्व को सम्मान दिया जाता है,वास्तव में वहीं धर्म है। उन्होंने ने कहा कि वैश्विक संदर्भ में शांति,पर्यावरण और आर्थिक असमानता पर भले ही चर्चा हो रही हो,लेकिन समाधान दूर दिखाई देता है। इसके लिए प्रमाणिकता से सोचना होगा। इसी से संतुलित बुद्धि और धर्म दृष्टि का विकास करना होगा। भारतीय आचरण पर चर्चा करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि हमने हमेशा अपने नुकसान की अनदेखी करते हुए संयम रखा है। जिन लोगों ने हमें नुकसान पहुंचाया,उन्हें भी संकट में मदद दी है। व्यक्ति और राष्ट्रों के अहंकार से शत्रुता पैदा होती है,लेकिन अहंकार से परे हिन्दुस्तान है। भारतीय समाज को अपने आचरण से दुनिया में उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। भविष्य की दिशा पर मोहन भागवत ने कहा कि संघ का उद्देश्य है कि सभी स्थानों,वर्गों और विभिन्न स्तरों पर संघ कार्य, विचार पहुंचे। साथ ही समाज में अच्छा काम करने वाली सज्जन शक्ति का अभ्युदय हो। इससे समाज स्वयं संघ की ही तरह चरित्र निर्माण और देशभक्ति के कार्य हो सकेगा। इसके लिए हमें समाज के कोने-कोने तक संघ कार्य एवं विचार को पहुंचना होगा। भौगोलिक दृष्टि से सभी स्थानों और समाज के सभी वर्गों एवं स्तरों में संघ की शाखा पहुंचानी होगी। सज्जन शक्ति से हम संपर्क करेंगे और उनका आपस में भी संपर्क कराएंगे। उन्होंने कहा कि संघ मानता है कि हमें समाज में सद्भावना लानी होगी और समाज के ओपिनियन मेकर्स से निरंतर मिलना होगा। इनके माध्यम से एक सोच विकसित करनी होगी। वे अपने समाज के लिए काम करें,उसमें हिन्दू समाज को अंग होने का अनुभव पैदा हो और वे भौगोलिक परिस्थितियों से जुड़ी चुनौतियों का स्वयं समाधान ढूंढे। दुर्बल वर्गों के लिए काम करें। संघ ऐसा करके समाज के स्वभाव में परिवर्तन लाना चाहता है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि बाहर से आक्रामकता के कारण धार्मिक विचार भारत में आए। किसी कारण से उन्हें कुछ लोगों ने स्वीकार किया। वे लोग यहीं के हैं,लेकिन विदेशी विचारधारा होने के कारण जो दूरियाँ बनीं,उन्हें मिटाने की ज़रूरत है। हमें दूसरे के दर्द को समझना होगा। एक देश,एक समाज और एक राष्ट्र के अंग होने के नाते,विविधताओं के बावजूद,समान पूर्वजों और साझा सांस्कृतिक विरासत के साथ आगे बढ़ना होगा। यह सकारात्मकता और सद्भाव के लिए आवश्यक है। इसमें भी हम समझ-बूझकर एक-एक कदम आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं। आर्थिक दृष्टि पर उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे प्रयोग हुए हैं,लेकिन अब राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक प्रतिमान गढ़ना होगा। हमें एक ऐसा विकास मॉडल प्रस्तुत करना होगा, जिसमें आत्मनिर्भरता,स्वदेशी और पर्यावरण का संतुलन हो। ताकि वे विश्व के लिए उदाहरण बने। पड़ोसी देशों से रिश्तों पर संघ प्रमुख ने कहा कि नदियां,पहाड़ और लोग वही हैं,केवल नक्शे पर लकीरें खींची गई हैं। विरासत में मिले मूल्यों से सबकी प्रगति हो,इसके लिए उन्हें फिर से जोड़ना होगा। पंथ और संप्रदाय अलग हो सकते हैं,पर संस्कारों पर मतभेद नहीं होने चाहिए। पंच परिवर्तन पर बोलते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि दुनिया में परिवर्तन लाने से पहले हमें अपने घर से समाज परिवर्तन की शुरुआत करनी होगी। इसके लिए संघ ने पंच परिवर्तन बताये हैं। यह हैं कुटुंब प्रबोधन,सामाजिक समरसता,पर्यावरण संरक्षण,स्व की पहचान तथा नागरिक कर्तव्यों का पालन। उन्होंने उदाहरण दिया कि पर्व-त्योहार पर पारंपरिक वेशभूषा पहनें,स्वभाषा में हस्ताक्षर करें और स्थानीय उत्पादों को सम्मानपूर्वक खरीदें। उन्होंने कहा कि हंसते-हंसते हमारे पूर्वज फांसी पर चढ़ गए,लेकिन आज आवश्यकता है कि हम 24 घंटे देश के लिए जीएं। हर हाल में संविधान और नियमों का पालन करना चाहिए। यदि कोई उकसावे की स्थिति हो तो न टायर जलाएं,न हाथ से पत्थर फेंकें। उपद्रवी तत्व ऐसे कार्यों का लाभ उठाकर हमें तोड़ने का प्रयास करते हैं। हमें कभी उकसावे में आकर अवैध आचरण नहीं करना चाहिए। छोटी-छोटी बातों में भी देश और समाज का ध्यान रखकर अपना काम करना चाहिए। लेखक-शिक्षाविद कमल किशोर डुकलान।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार केवल स्वेच्छा से होना चाहिए,दबाव में नहीं–मोहन भागवत
