
“चिपको आंदोलन” प्रकृति से साक्षात दर्शन:
देहरादून I शैल कला एवं ग्रामीण विकास समिति के तत्वावधान में “चिपको आंदोलन” की वर्षगांठ के अवसर पर एक बैठक का आयोजन संगठन के कार्यालय में किया गया, स्वामी एस चंद्रा ने कहा हमें केवल इतिहास नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी भी याद दिलाती है। ‘चिपको केवल पेड़ों से चिपकने का आंदोलन नहीं था, यह प्रकृति से जुड़ने का दर्शन था। चिपको आंदोलन’ की शुरुआत गढ़वाल के रेणी गाँव से हुई, जहाँ चिपको आंदोलन की प्रेरणाश्रोत गौरा देवी और ग्रामीण महिलाओं ने यह साबित किया कि जंगल केवल लकड़ी नहीं, बल्कि जीवन—मिट्टी, पानी और हवा का आधार है, चंडी प्रसाद भट्ट और सुन्दर लाल बहुगुणा ने इस चेतना को जन-जन तक पहुँचाकर इसे वैश्विक आंदोलन बना दिया। आज, 52 वर्ष बाद भी स्थिति चिंताजनक है—पेड़ों की कटाई, अनियंत्रित शहरीकरण और प्रदूषण हमारी प्रकृति और अस्तित्व दोनों के लिए खतरा बन चुके हैं।
डॉ स्वामी एस चंद्रा ने अपने संबोधन में कहा आवश्यकता आज है कि हम “भोगवादी संस्कृति” से हटकर “जल और वन संस्कृति” को अपनाएँ। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन ही भविष्य है!
“पेड़ बचेंगे तो पहाड़ बचेंगे,
पहाड़ बचेंगे तो जीवन बचेगा।”
इस अवसर पर शैल कला एवं ग्रामीण विकास समिति पंजी के संस्थापक अध्यक्ष- स्वामी एस. चंद्रा, गति संस्था के नीरज उनियाल, आनन्द स्वरूप, अभ्यंश चंद्रा, अंशुल घई, अंशुल चौधरी सहित कई स्थानीय लोग उपस्थित रहे I
