जान हथेली पर रख केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों ने आग से बचाया जंगल और विश्वविद्यालय परिसर

देवप्रयाग/श्रीनगर गढ़वाल। जहां एक ओर जंगलों में धधकती आग पर्यावरण,वन्यजीवन और मानव बस्तियों के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है,वहीं दूसरी ओर केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर देवप्रयाग के प्राध्यापकों ने साहस,समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा की ऐसी मिसाल पेश की, जिसने हर किसी को भावुक और गौरवान्वित कर दिया। करीब 50 हेक्टेयर जंगल में फैली भीषण आग को बुझाने के लिए विश्वविद्यालय के प्राध्यापक अपनी जान जोखिम में डालकर रातभर दावानल से जूझते रहे। खड़ी पहाड़ियों,चीड़ की सूखी पत्तियों,घने धुएं,अंधेरे और संसाधनों की भारी कमी के बावजूद शिक्षकों की टीम ने अदम्य साहस दिखाते हुए न केवल आग पर काबू पाया,बल्कि विश्वविद्यालय परिसर को भी एक बड़ी तबाही से बचा लिया। घटना शुक्रवार शाम की है,जब अलकनंदा नदी के बाएं किनारे स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर में अचानक अफरातफरी मच गई। पौड़ी के सबदरखाल क्षेत्र की ओर से जंगल में लगी आग तेजी से फैलते हुए विश्वविद्यालय परिसर की दिशा में बढ़ने लगी। चीड़ के जंगलों से उठती आग की ऊंची लपटें और धुएं का गुबार पूरे क्षेत्र को भयावह बना रहा था। वातावरण इतना धुएं से भर गया कि सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए परिसर प्रशासन ने तुरंत वन विभाग को सूचना दी। सूचना मिलने पर दो वनकर्मी मौके पर पहुंचे,लेकिन नृसिंहाचल क्षेत्र की खड़ी चढ़ाई और रास्ते की कठिन परिस्थितियों के कारण आग तक पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा था। ऐसे संकटपूर्ण समय में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर के निदेशक प्रोफेसर पीवीबी सुब्रह्मण्यम ने स्वयं मोर्चा संभाला। उन्होंने बिना देर किए परिसर और बालगुरुकुल के प्राध्यापकों की एक टीम गठित की और खुद नेतृत्व करते हुए जंगल की ओर रवाना हो गए। लगभग 12 फीट ऊंची परिसर की बाउंड्रीवाल पार कर टीम खतरनाक पहाड़ी रास्तों से होते हुए करीब डेढ़ घंटे बाद घटनास्थल तक पहुंची। वहां का दृश्य अत्यंत भयावह था। चीड़ की सूखी पत्तियां,घास और तेज हवा आग को और भड़का रही थी। जंगल में जगह-जगह आग धधक रही थी और आसपास के वन्यजीवों पर संकट मंडरा रहा था। वन विभाग के कर्मचारी नरोत्तम प्रसाद और मुकेश नेगी ने मोर्चा संभालते हुए टीम को दिशा-निर्देश दिए,जिसके बाद सभी लोग एकजुट होकर आग बुझाने में जुट गए। तीखी ढलानों,फिसलन और धुएं के बीच आग पर नियंत्रण पाना आसान नहीं था। कई बार टीम के सदस्य फिसले,कांटे चुभे और चोटिल भी हुए,लेकिन किसी ने हिम्मत नहीं हारी। अंधेरा बढ़ने के साथ हालात और भी चुनौतीपूर्ण हो गए,फिर भी पूरी टीम लगातार आग बुझाने में जुटी रही। लगभग डेढ़ घंटे की कठिन मशक्कत के बाद आग पर नियंत्रण पाने में सफलता मिली। इस दौरान टीम को जंगल में कई पक्षी जले और अधजली अवस्था में मिले,जिसने सभी को भीतर तक झकझोर दिया। लगभग 50 हेक्टेयर जंगल को आग की चपेट से बचाने और विश्वविद्यालय परिसर को सुरक्षित रखने के बाद टीम ने राहत की सांस ली। हालांकि आग बुझाने के बाद भी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। अंधेरे,पानी की कमी और प्रकाश व्यवस्था न होने के कारण अध्यापकों की टीम जंगल में रास्ता भटक गई। स्थिति इतनी कठिन हो गई कि एक कदम चलना भी मुश्किल हो रहा था। टीम ने खेड़ा गांव की ओर शरण लेने का प्रयास किया,लेकिन घने जंगल और अंधेरे के कारण रास्ता भटक गए। काफी संघर्ष और कठिनाइयों के बाद रात लगभग 10 बजे टीम किसी तरह सुरक्षित विश्वविद्यालय परिसर पहुंच पाई। इस साहसिक अभियान में डॉ.वीरेंद्र सिंह बर्त्वाल,डॉ.सुरेश शर्मा,डॉ.सुखदेव सिंह,डॉ.प्रदीप कुमार,डॉ.सूर्यकांत चौबे,करुण कुमार,दिगंबर रतूड़ी,सुनील गोदियाल और संपदा अधिकारी उमाकांत भट्ट सहित कई लोग शामिल रहे।
गौरतलब है कि वर्ष 2024 में भी विश्वविद्यालय परिसर के तीनों ओर भीषण आग लग चुकी थी,जिसमें परिसर को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। उस दौरान विद्युत केबल सहित कई व्यवस्थाएं आग की भेंट चढ़ गई थीं और परिसर को लगभग 30 लाख रुपये का नुकसान हुआ था। निदेशक प्रोफेसर पीवीबी सुब्रह्मण्यम ने कहा कि बिना संसाधनों के विकट परिस्थितियों में टीम ने जिस साहस और समर्पण के साथ यह कार्य किया,वह अत्यंत प्रेरणादायक है। उन्होंने कहा कि यह केवल आग बुझाने का कार्य नहीं था,बल्कि परिसर और प्रकृति के प्रति शिक्षकों की गहरी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का परिचायक है। उन्होंने बताया कि भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचाव के लिए जंगल से लगती परिसर की सीमा पर लगभग 18 फीट चौड़ा सीमेंट मार्ग बनाया जाएगा,जिससे आग को परिसर तक पहुंचने से रोका जा सके। साथ ही प्रकृति के अनुकूल दीर्घकालिक सुरक्षा उपाय भी किए जाएंगे। कुलपति प्रोफेसर श्रीनिवास वरखेड़ी ने भी इस साहसिक कार्य की सराहना करते हुए कहा कि प्रोफेसर सुब्रह्मण्यम के नेतृत्व में प्राध्यापकों की टीम ने असाधारण साहस का परिचय दिया है। उन्होंने कहा कि यह टीम विश्वविद्यालय परिवार ही नहीं,बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
