Thursday 06/ 08/ 2026 

Bharat Najariya
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राज्य

नमामि गंगे की अनूठी पहल-अलकनंदा में प्रवाहित की गई 7000 महाशीर मछलियां,नदी की जैव-विविधता संरक्षण को मिला नया संबल


श्रीनगर गढ़वाल। पवित्र अलकनंदा नदी की जैव-विविधता को संरक्षित एवं समृद्ध बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत अलकनंदा बांध क्षेत्र से ऊपर धारी देवी के निकट 7000 महाशीर मछलियों की अंगुलिकाओं (बच्चों) को नदी में प्रवाहित किया गया। यह अभियान न केवल नदी के पारिस्थितिक संतुलन को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा,बल्कि उत्तराखंड की राजकीय मछली महाशीर के संरक्षण और संवर्धन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह कार्यक्रम केंद्रीय अंतःस्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान बैरकपुर (कोलकाता), हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग तथा मत्स्य विभाग टिहरी गढ़वाल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में नदी संरक्षण,जलीय जैव-विविधता संवर्धन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने का संदेश भी दिया गया। इस अवसर पर जंतु विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मंजू प्रकाश गुसाईं,छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रोफेसर ओ.पी.गुसाईं,विश्वविद्यालय मत्स्य प्रजनन केंद्र के समन्वयक प्रोफेसर दीपक सिंह,मत्स्य विभाग टिहरी गढ़वाल से पुष्कर सिंह नयाल और संजय सिंह सहित अनेक विशेषज्ञ एवं शोधार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रोफेसर दीपक सिंह ने कहा कि महाशीर हिमालयी नदियों की पहचान मानी जाती है तथा इसे उत्तराखंड की राजकीय मछली का दर्जा प्राप्त है। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में नदी प्रदूषण,बांध निर्माण,प्राकृतिक आवासों में बदलाव और अन्य मानवीय गतिविधियों के कारण महाशीर की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने इसे संकटग्रस्त प्रजातियों की श्रेणी में रखा है। ऐसे में इसका संरक्षण समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है। उन्होंने बताया कि हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के चौरास परिसर में अलकनंदा जलविद्युत कंपनी के सहयोग से महाशीर प्रजाति के संरक्षण हेतु एक आधुनिक मत्स्य प्रजनन केंद्र विकसित किया गया है। इसी प्रकार टिहरी गढ़वाल स्थित मत्स्य विभाग के प्रजनन केंद्र में भी महाशीर प्रजाति का संवर्धन किया जा रहा है। इन दोनों केंद्रों में तैयार की गई 7000 महाशीर अंगुलिकाओं को अलकनंदा नदी में प्रवाहित किया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि महाशीर केवल एक मछली नहीं,बल्कि हिमालयी नदी तंत्र की सेहत का महत्वपूर्ण संकेतक है। यह नदी के खाद्य चक्र,पारिस्थितिक संतुलन और जैव-विविधता को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। इसके संरक्षण से नदी की प्राकृतिक संरचना और जलीय जीवन को भी मजबूती मिलेगी। नमामि गंगे परियोजना से जुड़े वैज्ञानिक डॉ.उपेंद्र सिंह,डॉ.जितेंद्र सिंह राणा और डॉ.रणजीत सिंह ने महाशीर संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि नमामि गंगे अभियान के अंतर्गत अब तक गंगा एवं उसकी सहायक नदियों में विभिन्न स्थानों पर लगभग 40 हजार महाशीर मछलियों के बच्चों को छोड़ा जा चुका है। इसके सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं और कई क्षेत्रों में महाशीर की संख्या में वृद्धि के संकेत प्राप्त हुए हैं। कार्यक्रम में शोधार्थी सचिन,राहुल,अजय,आयुष,राकेश सहित बड़ी संख्या में स्थानीय मत्स्य पालकों और युवाओं ने भी सहभागिता की। सभी ने अलकनंदा नदी को स्वच्छ,निर्मल और जीवंत बनाए रखने तथा जलीय जीवों के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास करने का संकल्प लिया। यह पहल नमामि गंगे अभियान के उस व्यापक उद्देश्य को साकार करती है,जिसके तहत केवल नदियों की स्वच्छता ही नहीं,बल्कि उनकी जैव-विविधता,प्राकृतिक विरासत और पारिस्थितिक संतुलन को भी पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है। अलकनंदा में 7000 महाशीर मछलियों का प्रवाह इसी दिशा में एक प्रेरणादायी और दूरगामी कदम माना जा रहा है।

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