नवाचार और भारतीय ज्ञान परंपरा से संवरेगा भविष्य का शिक्षा तंत्र-गढ़वाल विश्वविद्यालय में चार दिवसीय राष्ट्रीय क्षमता संवर्धन कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ

 

 

श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड की देवभूमि सांस्कृतिक,शैक्षिक एवं आध्यात्मिक नगरी श्रीनगर गढ़वाल स्थित हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय में शिक्षक शिक्षा,व्यावसायिक दक्षता और शैक्षिक नवाचारों को नई दिशा देने की महत्वपूर्ण पहल की गई है। विश्वविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आईक्यूएसी) की ओर से राष्ट्रीय नवोदय नेतृत्व संस्थान नोएडा के संयुक्त तत्वावधान में 2 से 5 नवंबर 2026 तक आयोजित चार दिवसीय क्षमता संवर्धन कार्यक्रम का सोमवार को विधिवत शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम में उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश के विभिन्न जवाहर नवोदय विद्यालयों से आए शिक्षक-शिक्षिकाएं प्रतिभाग कर रहे हैं। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों को बदलती शैक्षिक आवश्यकताओं,आधुनिक शिक्षण तकनीकों,नवाचारों तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप नवीन शिक्षण पद्धतियों से दक्ष बनाना है। कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय की ओर से सभी अतिथियों का पारंपरिक शॉल,स्मृति चिह्न एवं तुलसी का पौधा भेंट कर स्वागत एवं अभिनंदन किया गया।‌समारोह का विशेष आकर्षण शोधार्थी स्नेहलता द्वारा विश्वविद्यालय के कुलगीत की सांकेतिक भाषा में प्रस्तुत अभिव्यक्ति रही। उनकी इस प्रस्तुति ने समावेशी शिक्षा,समान अवसर और सुलभ शिक्षण व्यवस्था का प्रेरक संदेश दिया। कार्यक्रम की समन्वयक एवं आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ की उपनिदेशक प्रो.सीमा धवन ने सभी अतिथियों,शिक्षाविदों एवं प्रतिभागी शिक्षकों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि दून विश्वविद्यालय देहरादून की कुलपति प्रो.सुरेखा डंगवाल ने अपने संबोधन में शिक्षक के व्यावसायिक विकास,भावनात्मक जुड़ाव तथा संस्थागत अपनत्व के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। ऐसे में शिक्षकों को अपनी शिक्षण पद्धतियों,व्यावसायिक दक्षताओं और कार्यशैली में निरंतर सुधार करते हुए समय की बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को विकसित करना होगा। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना अथवा विद्यार्थियों को विषयगत जानकारी देना नहीं होना चाहिए,बल्कि उनमें व्यावहारिक कौशल,रचनात्मकता,नवाचार,संवेदनशीलता,नेतृत्व क्षमता और आलोचनात्मक चिंतन का विकास करना भी आवश्यक है। प्रो.डंगवाल ने क्लस्टर सुविधाओं के अधिकतम उपयोग तथा भविष्य में एकल शिक्षक वाली कक्षाओं की संभावनाओं पर भी अपने विचार रखे। उन्होंने विशेष रूप से दक्षता आधारित शिक्षक की अवधारणा को भारतीय पहचान,सांस्कृतिक मूल्यों और भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप विकसित करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा,स्थानीय परिवेश,सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक शैक्षिक दृष्टिकोण का समन्वय करते हुए ऐसी शिक्षक व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए,जो विद्यार्थियों की विविध आवश्यकताओं को समझने और उनका सर्वांगीण विकास करने में सक्षम हो। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की मूल भावना भी इसी प्रकार की सशक्त,संवेदनशील और उत्तरदायी शिक्षा व्यवस्था के निर्माण पर केंद्रित है। गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.श्रीप्रकाश सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि विश्वविद्यालय शिक्षक शिक्षा एवं प्रशिक्षण के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। इस प्रकार के क्षमता संवर्धन कार्यक्रम शिक्षकों के व्यावसायिक विकास के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण एवं समावेशी शिक्षा को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षक के लिए केवल विषय का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है। उसे तकनीकी दक्षता,व्यावहारिक कौशल और आधुनिक शिक्षण विधियों का भी ज्ञान होना चाहिए। शिक्षकों को नवीन तकनीकों एवं शैक्षिक नवाचारों को कक्षा-कक्ष तक पहुंचाने के साथ-साथ उन्हें विद्यार्थियों के वास्तविक जीवन और उनकी आवश्यकताओं से जोड़ना होगा। कुलपति ने कहा कि शिक्षक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शिक्षक केवल ज्ञान का संवाहक नहीं होता,बल्कि वह भावी पीढ़ी के चरित्र,विचार,दृष्टिकोण,नैतिक मूल्यों और सामाजिक चेतना का निर्माण भी करता है। इसलिए शिक्षक का दायित्व कक्षा-कक्ष तक सीमित नहीं है,बल्कि एक जागरूक,सशक्त,समावेशी और विकसित राष्ट्र के निर्माण में उसकी भूमिका निर्णायक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम शिक्षकों की क्षमताओं को निखारने,नवीन शैक्षिक दृष्टिकोणों के आदान-प्रदान तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन शिक्षा से जोड़ने में महत्वपूर्ण साबित होंगे। कार्यक्रम की समन्वयक प्रो.सीमा धवन ने बताया कि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.श्रीप्रकाश सिंह के मार्गदर्शन में आयोजित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप सतत व्यावसायिक विकास की अवधारणा को केंद्र में रखकर तैयार किया गया है। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा,दक्षता आधारित शिक्षण पद्धतियों तथा वर्तमान शैक्षिक आवश्यकताओं को विशेष रूप से शामिल किया गया है। इसके अंतर्गत शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षक व्यावसायिक मानक,राष्ट्रीय मार्गदर्शन मिशन,कृत्रिम बुद्धिमत्ता,अनुभवात्मक शिक्षण और डिजिटल शिक्षा जैसी आधुनिक तकनीकों एवं नवाचारों से परिचित कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य शिक्षकों की शिक्षण दक्षताओं को विकसित करना तथा कक्षा शिक्षण को अधिक प्रभावी,व्यावहारिक,विद्यार्थी केंद्रित और तकनीक आधारित बनाना है। उद्घाटन समारोह में विश्वविद्यालय के नियुक्ति एवं पदोन्नति अधिष्ठाता प्रो.एम.एस.पंवार,बिरला परिसर के निदेशक प्रो.एच.बी.एस.चौहान तथा कुलसचिव प्रो.वाई.पी.रैवानी ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने शिक्षक प्रशिक्षण,उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और शैक्षिक संस्थानों में नवाचार की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर प्रो.सुनीता गोदियाल ने कुलपति प्रो.श्रीप्रकाश सिंह का विशेष आभार व्यक्त किया। उन्होंने चौरास स्थित टिहरी परिसर में बीपीएड.पाठ्यक्रम प्रारंभ करने की पहल के लिए कुलपति का धन्यवाद किया। साथ ही कार्यक्रम में उपस्थित सभी गणमान्य अतिथियों,प्रतिभागी शिक्षकों,आयोजन समिति के सदस्यों तथा दिल्ली से पहुंचे प्रो.रजनी रंजन सौमित्र के प्रति आभार व्यक्त किया। उद्घाटन समारोह का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। इसके बाद सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों ने सामूहिक छायाचित्र में सहभागिता की। कार्यक्रम का संचालन डॉ.अनु राही ने किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के प्राध्यापक एवं शिक्षाविद् प्रो.एम.एम.सेमवाल,प्रो.आर.एस.नेगी,प्रो.गुड्डी बिष्ट,प्रो.वी.आर.पुरोहित,डॉ.शंकर सिंह,डॉ.सुमन लता तिरुवा,डॉ.सपना सेन,डॉ.रमेश राणा,डॉ.सिद्धार्थ लोहानी एवं डॉ.आलोक सागर गौतम सहित अनेक शिक्षक एवं शिक्षाविद् उपस्थित रहे। चार दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के प्रथम तकनीकी सत्र में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) उत्तराखंड के विशेषज्ञ प्रदीप रावत ने राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा,दक्षता आधारित अधिगम एवं अधिगम प्रतिफल विषय पर विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रमुख प्रावधानों पर प्रकाश डालते हुए मातृभाषा आधारित शिक्षण,प्रौद्योगिकी के उपयोग,खेल एकीकृत शिक्षा तथा विभिन्न विषयों के समेकित दृष्टिकोण की महत्ता समझाई। उन्होंने कहा कि दक्षता आधारित शिक्षण पद्धति विद्यार्थियों में केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहकर वास्तविक जीवन की समस्याओं को समझने,उनका समाधान खोजने,तार्किक सोच विकसित करने और व्यावहारिक कौशल अर्जित करने की क्षमता पैदा करती है। उन्होंने सतत आकलन एवं अनुभवात्मक शिक्षण को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का महत्वपूर्ण आधार बताया। कार्यक्रम के द्वितीय तकनीकी सत्र में दिल्ली स्थित डॉ.भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के डॉ.ऋषभ कुमार मिश्रा ने शिक्षक दक्षता एवं शिक्षण शास्त्र से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर व्याख्यान दिया। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के माता सुंदरी महाविद्यालय की प्रो.रवनीत कौर ने भी अपने विषयगत सत्र के माध्यम से शिक्षकों को महत्वपूर्ण जानकारियां प्रदान की। चार दिनों तक चलने वाले इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में शिक्षकों को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों,नवीन शिक्षण पद्धतियों,तकनीकी संसाधनों,विद्यार्थियों की बदलती आवश्यकताओं तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षण के विभिन्न पहलुओं से रूबरू कराया जाएगा। विश्वविद्यालय में आयोजित यह पहल न केवल नवोदय विद्यालयों के शिक्षकों की व्यावसायिक दक्षता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है,बल्कि विद्यालयी शिक्षा और उच्च शिक्षा संस्थानों के बीच अकादमिक समन्वय को भी मजबूती प्रदान करेगी। निश्चित रूप से इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम नई पीढ़ी को गुणवत्तापूर्ण,समावेशी,व्यावहारिक एवं संस्कारयुक्त शिक्षा प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।