श्रीनगर गढ़वाल। बाल शिक्षा-लोक साहित्य की धरती पर खिलते संस्कारों के पुष्प शिक्षा केवल किताबी ज्ञान भर नहीं,अपितु बालक की जन्मजात शक्तियों के चौमुखी विकास की आधारशिला है। जब हम स्कूलों में पढ़ने वाले नौनिहालों की शिक्षा की बात करते हैं,तो यह केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रह जाती। यह बच्चे के चारों ओर के परिवेश,गुरुजन के स्वभाव,विद्यालय के संस्कारित वातावरण,परिवार और ग्राम्य परिवेश के समेकित प्रभाव का परिणाम होती है। यह सब मिलकर बालक के बौद्धिक,सामाजिक,नैतिक और आध्यात्मिक विकास का आधार बनाते हैं। ऋषिकुल परंपरा-शिक्षा की महान जड़ें अगर हम प्राचीन शिक्षा पद्धति की ओर नजर डालें,तो पाएंगे कि वह आज की तुलना में कहीं अधिक मूल्यपरक और उच्चकोटि की थी। ऋषिकुल शिक्षा पद्धति में ब्रह्मचर्य व्रत और गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से बालक का सम्पूर्ण विकास सुनिश्चित किया जाता था। त्रेता युग में महर्षि विश्वामित्र का आश्रम,द्वापर युग में गुरु संदीपनि और द्रोणाचार्य के गुरुकुल आज भी हमारे लिए आदर्श बने हुए हैं। नालंदा और तक्षशिला-गौरवशाली विश्वविद्यालय परंपरा ऋषिकुल परंपरा से जन्मे नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय ज्ञान की विश्वविख्यात पीठिकाएं थीं। उस समय बालक किताबी बोझ से मुक्त रहते हुए प्रकृति के संग शिक्षित होते थे। संस्कार,नैतिकता,अनुशासन,नियमितता और उच्चारण की शुद्धता ही शिक्षा का मूल हुआ करती थी। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षा का नवस्वरूप-आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित किया जा रहा है। उत्तराखंड सरकार द्वारा स्कूली पाठ्यक्रम में रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता जैसे ग्रंथों को शामिल करना इस दिशा में एक स्वागत योग्य पहल है। नई शिक्षा नीति आदर्शवाद, प्रकृतिवाद और यथार्थवाद जैसे सिद्धांतों पर आधारित बनावटी और बोझिल पढ़ाई से हटकर बनि-बनिका यानी बालक की रुचियों व क्षमताओं के अनुरूप शिक्षा को केंद्र में रखती है। बाल-केन्द्रित शिक्षण-अभिनव प्रयोगों की ओर नै पढ़ैं नै बात यानी शिक्षा में दृश्य चित्रण चार्ट प्रदर्शनी,रंगीन शिक्षण सामग्री और संवादात्मक शिक्षण पद्धति अपनाकर शिक्षक अब विषय को सरल, सुगम और प्रभावी बनाने के प्रयास कर रहे हैं। इससे बालकों का अध्ययन के प्रति उत्साह भी बढ़ रहा है और गुरु के प्रति भय का वातावरण धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। खेल,हास्य,कविता,कहानीनव प्रयोगों की सीख आज का बालक अब केवल पुस्तक और उत्तर रटने तक सीमित नहीं रहा। वह खेल,कविता,नाट्य,कम्प्यूटर व संवाद के माध्यम से ज्ञान प्राप्त कर रहा है। नै पढ़ैं अब केवल बस्ता ढोने का नाम नहीं,बल्कि जीवन मूल्यों से सजी शिक्षा की बात बन चुकी है। भविष्य की पीढ़ी-गढ़वाली धरोहर से प्रेरित निर्माण हमारी भावी पीढ़ी अगर नै पढ़ैं की गढ़वाली समझ, लोक साहित्य,नैतिक मूल्यों और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से शिक्षित होगी,तो वह न केवल आत्मनिर्भर बनेगी बल्कि समाज,गांव और देश की दिशा बदलने में भी समर्थ होगी। सुमित्रानंदन पंत,हेमवती नंदन बहुगुणा,बच्छेन्द्री पाल,गबर सिंह जैसे गढ़रत्न हमारे लिए उदाहरण हैं कि शिक्षा संस्कारों और मूल्यों से परिपूर्ण हो तो व्यक्ति समाज का दीपस्तंभ बन सकता है। लोकभाषा संरक्षण-नई शिक्षा नीति में गढ़वाली की जगह नै पढ़ैं नै बात केवल शिक्षा की नहीं,यह हमारी लोकभाषा गढ़वाली की आत्मा है। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा को महत्व देकर यह स्पष्ट संदेश दिया गया है कि बिना अपनी भाषा और संस्कृति के ज्ञान के कोई भी शिक्षा अधूरी है। गढ़वाली को विद्यालयों में स्थान देकर हम अपनी अगली पीढ़ी को भाषा के माध्यम से संस्कार,पहचान और आत्मगौरव की भेंट दे सकते हैं। निष्कर्षत-नै पढ़ैं अब केवल किताब नहीं,यह है हमारे बच्चों की आत्मा से जुड़ी गढ़वाली सोच,परंपरा,संस्कृति और शिक्षा की वह बात जो आज की आवश्यकता भी है और भविष्य की नींव भी। लेखक: कमल किशोर डुकलान ‘सरल’ लोक साहित्य प्रेमी,शिक्षाविद्,गढ़वाली भाषा के संवाहक
नै पढ़ैं की नै बात-गढ़वाली लोक साहित्य पर आधारित भावपूर्ण लेख-शिक्षाविद कमल किशोर डुकलान
