श्रीनगर गढ़वाल इतिहास केवल अतीत का वर्णन नहीं होता वह भावी पीढ़ियों के लिए चिंतन की धुरी और आत्मबोध का स्तंभ होता है। भारत में इतिहास लेखन की दशा और दिशा लंबे समय से एकपक्षीय और विजेताओं की दृष्टि से संचालित रही है। विशेष रूप से मुगल शासनकाल और अकबर जैसे आक्रांताओं को जिस प्रकार महान घोषित कर उनके यशोगान से पाठ्य पुस्तकें भरी गईं,वह भारत की सांस्कृतिक अस्मिता और ऐतिहासिक सत्य के साथ अन्याय है। क्या अकबर सचमुच ‘महान’ था-यदि हम तथ्यों की कसौटी पर परखें तो यह विशेषण संदेह के घेरे में आता है। 15 वीं शताब्दी में चित्तौड़ किले की घेराबंदी के बाद अकबर ने 30,000 से अधिक हिंदुओं का रक्तरंजित नरसंहार करवाया। फतेहनामा-ए-चितौड़ और अकबरनामा जैसे तत्कालीन ग्रंथ इस क्रूरता की साक्षी हैं। फिर प्रश्न उठता है कि इतिहास में केवल उसकी धर्मनिरपेक्ष छवि क्यों गढ़ी गई। एनसीईआरटी का प्रयास-एक नई सोच की ओर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) द्वारा सामाजिक विज्ञान की कक्षा आठवीं की पुस्तक Exploring Society,India and Beyond में किए गए संशोधन भारत-केंद्रित इतिहास लेखन की दिशा में एक स्वागतयोग्य प्रयास हैं। 13 वीं से 17 वीं शताब्दी के मध्यकालीन कालखंड को अब नए ऐतिहासिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है,जिसमें केवल सल्तनत और मुगलों की विजयगाथा नहीं,मराठों,सिखों,राजपूतों,विजयनगर साम्राज्य और जनआंदोलनों के संघर्षों को भी बराबरी से स्थान मिला है। इतिहास के पुनर्लेखन का यह प्रयास उन असंख्य वीरों को न्याय दिलाने की दिशा में है,जिन्हें अब तक हाशिए पर रखा गया। अकबर की महानता बनाम प्रताप का पराक्रम-इतिहास की पुस्तकों में अकबर को महान बनाकर प्रस्तुत किया गया,किंतु वही अकबर महाराणा प्रताप जैसे राष्ट्रनिष्ठ,स्वाभिमानी और निडर योद्धा को आजीवन झुका न सका। महाराणा प्रताप,छत्रपति शिवाजी,गुरु गोविंद सिंह,दुर्गादास राठौड़ जैसे वीरों का इतिहास वर्षों तक उपेक्षित क्यों रहा,क्या इन महापुरुषों ने कभी धर्म या पूजा पद्धति के आधार पर किसी का उत्पीड़न किया नहीं। उन्होंने हमेशा आत्मरक्षा,संस्कृति संरक्षण और मानव-मूल्यों की रक्षा के लिए युद्ध किए न कि आक्रमण और वर्चस्व के लिए। औरंगजेब-मजहबी कट्टरता का प्रतीक औरंगजेब को भी वर्षों तक एक योग्य प्रशासक के रूप में प्रस्तुत किया गया,जबकि उसका शासन हिंदू समाज के लिए एक अमानवीय त्रासदी से कम नहीं था। 1669 में उसने हिंदुओं पर जजिया कर लगाया,त्योहारों पर प्रतिबंध लगाए,राम मंदिर,काशी विश्वनाथ,मथुरा सहित हजारों मंदिरों को तुड़वाया और हिंदुओं की सामाजिक स्वतंत्रता का गला घोंटने के आदेश जारी किए। उसका शासनकाल धार्मिक दमन,सांस्कृतिक विध्वंस और मानवाधिकारों के खुले उल्लंघन का युग था। मआसिर-ए-आलमगीरी जैसे ग्रंथ इन काले अध्यायों के साक्ष्य हैं। क्यों जरूरी है इतिहास का पुनर्लेखन-वास्तविक इतिहास वो होता है जो जनता के संघर्षों,आत्मबलिदानों और संस्कृति की रक्षा की गाथा को केंद्र में रखे। मुगलों के अत्याचारों,नरसंहारों,मंदिर विध्वंसों और क्रूरता को प्रशासनिक दक्षता या धार्मिक सहिष्णुता की चादर ओढ़ाकर पेश करना-इतिहास का ही नहीं,राष्ट्र की आत्मा का भी अपमान है। आज आवश्यकता है कि हम अपनी नई पीढ़ी को भारत की गौरवगाथा से जोड़ें,उन्हें बताएं कि अकबर से पहले और बाद में भी भारत में महानता जीवित थी-शिवाजी,प्रताप,सम्राट हर्षवर्धन,भोज,रानी लक्ष्मीबाई,गुरु तेग बहादुर,नेताजी,सरदार पटेल जैसे नायकों के रूप में। निष्कर्ष-भारत का इतिहास मुगल दरबारों के चमकते कंगूरों में नहीं,बल्कि मेवाड़ के रक्तरंजित मैदानों,सिंहगढ़ के किलों और सिखों की गुरुत्वपूर्ण गाथाओं में बसता है। अब समय आ गया है कि हम गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलकर अपने इतिहास का पुनर्लेखन करें,ताकि हमारी भावी पीढ़ियां गौरवशाली,आत्मसम्मान से भरा और सत्यनिष्ठ भारत को जान सकें। अब समय आ गया है 16 वीं शताब्दी में हजारों हिन्दुओं का नरसंहार करने वालों का महिमा मंडन बंद कर स्व.स्वत्व और भारत केंद्रित इतिहास का पुनर्लेखन किया जाना चाहिए।
अब समय है भारत के केंद्रित इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता–कमल किशोर डुकलान
