रक्षाबंधन: स्नेह,संकल्प और संस्कृति का पवित्र पर्व लेखक–अखिलेश चन्द्र चमोला

श्रीनगर गढ़वाल। भारतीय संस्कृति की विशेषता उसकी विविधता में निहित एकता और उत्सवधर्मिता में छिपी आत्मीयता है। यहां प्रत्येक पर्व केवल उत्सव नहीं,बल्कि जीवन मूल्य,परंपरा और गहरे भावनात्मक संबंधों का प्रतीक होता है। ऐसा ही एक पावन पर्व है रक्षाबंधन,जो भाई-बहन के अटूट प्रेम,विश्वास और कर्तव्य का अमर प्रतीक है। श्रावण मास की शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह त्योहार बहनों द्वारा भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने और भाइयों द्वारा बहनों की आजीवन रक्षा का संकल्प लेने का उत्सव है। यह केवल एक रेशम की डोरी नहीं,बल्कि स्नेह और सुरक्षा के बंधन का प्रतीक है,जो हृदयों को जोड़ता है। धार्मिक ग्रंथों में रक्षाबंधन की पौराणिक गाथाएं-भारतीय धर्मग्रंथों में रक्षाबंधन को लेकर कई मार्मिक प्रसंग उपलब्ध हैं। एक कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में एक बार चोट लग गई। जब रक्त बहना बंद नहीं हुआ तो द्रौपदी ने तत्काल अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनके हाथ पर बांध दिया। यह भावुक क्षण इतना प्रभावशाली था कि श्रीकृष्ण ने इसे रक्षा सूत्र मानते हुए द्रौपदी को वचन दिया,जब-जब तुम संकट में होगी,मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा। इसी वचन का निर्वाह उन्होंने द्रौपदी चीरहरण के समय किया। एक ऐतिहासिक प्रसंग में रानी कर्मावती ने मुगल सम्राट हुमायूं को रक्षासूत्र भेजकर चित्तौड़ की रक्षा हेतु सहायता मांगी थी। हुमायूं ने राखी की लाज रखी और रानी की रक्षा के लिए तत्काल सेना भेज दी। स्वर्ग की रक्षा में भी रक्षासूत्र की भूमिका-देवताओं और राक्षसों के बीच चले 12 वर्षों के युद्ध में जब देवराज इंद्र पराजित हो गए,तो वे देवगुरु बृहस्पति के पास गए। गुरु बृहस्पति ने उन्हें श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन ब्राह्मणों द्वारा रक्षा सूत्र बंधवाने की सलाह दी। जैसे ही इंद्र ने रक्षा सूत्र धारण किया,उन्हें विजय प्राप्त हुई। इस विजय को स्मरण कर यह पर्व मनाया जाने लगा। यम और यमुना की अमर कहानी-मृत्यु के देवता यमराज की बहन यमुना ने भी उन्हें रक्षा सूत्र बांधा और उनसे अमरता का वरदान मांगा। यमराज ने प्रसन्न होकर वचन दिया कि जो भाई इस दिन बहन से राखी बंधवाएगा,वह दीर्घायु होगा और जीवन के संकटों से मुक्त रहेगा। 2025 में रक्षाबंधन का विशेष संयोग-इस वर्ष रक्षाबंधन का पर्व 9 अगस्त 2025 (श्रावण शुक्ल पूर्णिमा) को मनाया जाएगा। खास बात यह है कि इस दिन भद्रा काल की कोई बाधा नहीं है,जिससे दिनभर राखी बांधना शुभ रहेगा। ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 4:22 से 5:04 तक,अभिजीत मुहूर्त-दोपहर 12:17 से 12:53 तक,इस दिन सौभाग्य योग,शोभन योग और स्वार्थ सिद्ध योग जैसे कई शुभ संयोग भी बन रहे हैं,जो इस पर्व को और भी प्रभावकारी और दुर्लभ बना रहे हैं। यह दुर्लभ अवसर चार वर्षों बाद प्राप्त हो रहा है। समापन-रक्षाबंधन न केवल पारिवारिक प्रेम का प्रतीक है,बल्कि यह भारतीय संस्कृति की उन मूल भावनाओं को जीवित रखने का पर्व है,जो रिश्तों में त्याग,आदर और कर्तव्य को सर्वोपरि मानती हैं। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि एक डोरी में कितना गहरा अर्थ और भावना समाई हो सकती है,स्नेह की,संकल्प की और संस्कृति की।