रिश्तों की दरकती दीवारें-आधुनिक समाज में संबंधों की नई परिभाषा-कमल किशोर डुकलान

श्रीनगर गढ़वाल। वसुधैव कुटुंबकम की भावना से अभिसिंचित भारतीय संस्कृति में पारिवारिक रिश्ते सदा से मानवीय संवेदनाओं के मूल स्तंभ रहे हैं। लेकिन विडंबना देखिए,आज वही रिश्ते आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी गरिमा और गरमाहट दोनों खोते जा रहे हैं। संयुक्त परिवार व्यवस्था,जो कभी भारतीय समाज की पहचान थी,अब बिखराव की कगार पर है। रिश्तों की डोर अब केवल आवश्यकता और स्वार्थ की गांठों से बंधी रह गई है। दुखद यह है कि आजकल लोग संबंधों को निभाने के लिए नहीं,केवल अपने लाभ के लिए जीते हैं। गरीब या कमजोर रिश्तेदारों से कतराना और केवल काम के लोगों से जुड़ना सामाजिक व्यवहार का नया चलन बन गया है। आत्मकेन्द्रित होता मनुष्य और सिकुड़ती संवेदनाएं,विकास की दौड़ में मनुष्य जितना बाहर से समृद्ध हो रहा है,भीतर से उतना हीं खाली होता जा रहा है। आज शहरों से लेकर महानगरों तक एक अदृश्य दीवार खड़ी हो चुकी है,आत्मकेन्द्रिता की दीवार। मनुष्य अपने ही सुख-दुख में सीमित होकर जीने लगा है। नतीजा भावनात्मक रिश्ते-मां-पिता,भाई-बहन,चाचा-ताऊ जैसे जन्मजात संबंध-केवल सामाजिक पहचान का नाममात्र बनकर रह गए हैं। वैश्वीकरण की आंधी और रिश्तों की उड़ती जड़ें,आज का युग वैश्विक है। भौगोलिक दूरियां,नौकरी की व्यस्तताएं,और वर्चुअल संवादों की भरमार ने पारंपरिक रिश्तों की आत्मीयता को धीरे-धीरे क्षीण कर दिया है। आज बहुत से लोग ईमेल,व्हाट्सएप या वीडियो कॉल से ही अपने संबंध निभा रहे हैं। कभी जो रिश्ते छत के नीचे सांझा भोजन और सुख-दुख में बंधे रहते थे,अब वो स्क्रीन पर उंगलियों से खिसकते नजर आते हैं। मनपसंद रिश्ते-चमक-दमक में छिपी क्षणभंगुरता आज की पीढ़ी अपने मन से संबंध बनाती है-मित्रता,प्रेम,सहकर्मी,सोशल मीडिया कनेक्शन। ये रिश्ते आत्मनिर्भरता के प्रतीक होते हैं परंतु बेहद नाज़ुक भी। इनमें जितनी तेजी से नजदीकी आती है,उतनी ही जल्द टूट भी हो जाती है। इनके पीछे कोई सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं होता,न कोई परंपरागत मजबूरी इसलिए कड़वाहट भी अकेले ही झेलनी पड़ती है। पति-पत्नी का संबंध-सबसे चुनौतीपूर्ण समीकरण आज के दांपत्य जीवन में संतुलन सबसे बड़ी चुनौती है। जब दोनों जीवनसाथी कामकाजी हों,तो घर-परिवार और कार्यस्थल का दोहरा दबाव तनाव,असहिष्णुता और अहं की टकराहट को जन्म देता है। छोटी-छोटी बातों में तलाक,ब्रेकअप,या इमोशनल दूरी अब सामान्य हो गई है। अगर बीच-बचाव करने वाला कोई बड़ा नहीं हो,तो रिश्ता बस कानूनी समझौता बनकर रह जाता है। आभासी रिश्तों का जाल-निकटता का छलावा आजकल फेसबुक,इंस्टाग्राम,ट्विटर जैसे प्लेटफार्मों ने रिश्तों का एक नया आभासी संसार रच दिया है। ये रिश्ते कभी-कभी असली से भी ज्यादा आत्मीय लगते हैं,लेकिन इनका आधार समय और स्थान की सुविधा होता है,जैसे ही परिस्थितियां बदलती हैं,ये संबंध भी हवा हो जाते हैं। रिश्तों की बुनियाद-सम्मान,विश्वास और स्नेह कोई भी रिश्ता चाहे जन्म से हो या मन से टिकता है तो केवल परस्पर आदर,स्नेह,विश्वास और संकल्प की बुनियाद पर। यदि इन गुणों की कमी हो जाए,तो सबसे गहरे रिश्ते भी बिखर सकते हैं। आज के युग में,जहां गति ही प्राथमिकता है,वहां किसी के लिए ठहरना,सुनना और समझना अब विलासिता जैसी बात लगने लगी है। समझ,सहनशीलता और संवाद रिश्तों का मूलमंत्र,वर्तमान समाज में सबसे बड़ी कमी है,सहनशीलता और संवाद का अभाव। हर कोई चाहता है कि उसे समझा जाए,लेकिन कोई समझना नहीं चाहता। अपेक्षाएं इतनी बढ़ गई हैं कि उनका बोझ उठाते-उठाते रिश्ते दम तोड़ने लगते हैं। निष्कर्ष-मजबूरी नहीं,जिम्मेदारी बनें रिश्ते,रिश्ते यदि महज औपचारिकता या सामाजिक मजबूरी बनकर रह जाएं,तो वो खोखले हो जाते हैं। आज आवश्यकता है रिश्तों को समय,संवेदना और समर्पण देने की। बदलते युग की दौड़ में भी यदि हम थोड़ी देर रुककर,पीछे मुड़कर अपनों को देखें तो शायद रिश्तों की गर्माहट अब भी महसूस की जा सकती है। रिश्ते केवल नाम नहीं,जीवन की श्वास हैं। यदि उन्हें समय,स्नेह और समझ दी जाए,तो यही रिश्ते जीवन को पूर्णता प्रदान करते हैं। रिश्तों की यह अहमियत सदा अमिट है कल भी थी,आज भी है और कल भी रहेगी।