श्रीनगर गढ़वाल। पहाड़ की धरती पर जहां कभी हल की लकीरों में किसानों की उम्मीदें बोई जाती थीं,वहां आज ट्रैक्टर की दहाड़ सुनाई दे रही है। बदलते समय के साथ देवभूमि की खेती में भी नई तकनीक का प्रवेश हो चुका है,जिसने परंपरागत बैल और हल की जगह आधुनिक मशीनों को सौंप दी है। मगर इस परिवर्तन के बीच भी किसान का मिट्टी से जुड़ाव,उसके पसीने की खुशबू और अन्न उपजाने का हौसला जरा भी कमजोर नहीं पड़ा। ग्रामीण क्षेत्र के कई किसान कहते हैं कि बचपन से हल चलाते हुए खेतों में अपने सपनों को आकार देते आए हैं। आज जब ट्रैक्टर से खेत तैयार होते हैं,तब भी वही संतोष मिलता है,जो पहले बैलों की जोड़ी और हल से मिलता था। फर्क सिर्फ इतना है कि मेहनत की प्रक्रिया ने रफ्तार पकड़ ली है,लेकिन मेहनत का मतलब अब भी वही है धरती मां की गोद में नई फसल का जन्म देना। किसानों का मानना है कि बदलते समय के साथ कदम मिलाना जरूरी है,वरना खेती घाटे का सौदा बन जाती। ट्रैक्टर,रोटावेटर और दूसरी आधुनिक तकनीक ने जहां काम को आसान किया है,वहीं किसान की मेहनत और लगन में कोई कमी नहीं आने दी। एक बुजुर्ग किसान कहते हैं,हल छोड़ दिया पर हल के संस्कार नहीं छोड़े। मिट्टी में हाथ डालने का सुख आज भी वैसा ही है,जैसा बरसों पहले था। आज भले ही खेतों में बैलों की जोड़ी कम दिखती हो,पर किसान की आत्मा अब भी माटी में ही सांस लेती है। खेत में पहली जुताई के बाद जो सौंधी महक उठती है,वह चाहे हल से आए या ट्रैक्टर से किसान के लिए वही प्रेरणा बनकर रहती है। इस बदलाव को लेकर कृषि विशेषज्ञ भी मानते हैं कि आधुनिकता ने उत्पादन को बढ़ाया है,लागत घटाई है,लेकिन किसानों का हौसला,धैर्य और मिट्टी से प्यार ही असली पूंजी है,जो आने वाली पीढ़ियों को भी सिखानी होगी। देवभूमि के खेतों में हल भले ही रिटायर हो गया,लेकिन किसान का मिट्टी से रिश्ता आज भी उतना ही गहरा और पवित्र है। तकनीक चाहे जितनी बदल जाए,यह रिश्ता न कभी टूटेगा,न ही मुरझाएगा।
देवभूमि में हल ने छोड़ा खेत मशीन ने संभाली कमान पर मिट्टी से रिश्ता अब भी अमिट
