श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड अपनी आध्यात्मिकता,लोकसंस्कृति और परंपराओं के लिए विश्वभर में विशिष्ट पहचान रखता है। इन्हीं अमूल्य परंपराओं में एक है कुल पुरोहित-यजमान का वह पावन रिश्ता,जिसमें प्रेम,विश्वास और आस्था के धागे सदियों से बुने जा रहे हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं,बल्कि यह एक ऐसा अटूट बंधन है जो पीढ़ियों से पीढ़ियों तक सम्मान,सेवा और आपसी स्नेह की मिसाल पेश करता आ रहा है। रक्षा सूत्र और यज्ञोपवीत का पवित्र संगम-सावन और भाद्रपद के पवित्र महीनों में जब रक्षा बंधन और यज्ञोपवीत संस्कार का पर्व आता है,तब कुल पुरोहित अपने यजमानों के घर पहुंचकर रक्षा सूत्र (राखी) बांधते हैं और यज्ञोपवीत (जनेऊ) बदलने का पवित्र कार्य संपन्न करते हैं। यह केवल एक अनुष्ठान नहीं,बल्कि वर्षों पुराना वह प्रेम-सूत्र है,जो देवभूमि की सामाजिक और धार्मिक संरचना को मजबूती देता है। दक्षिणा का रूपांतर-अनाज से मुद्रा तक बीते समय में जब नकदी का चलन कम था,तब यजमान अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा के रूप में अनाज,धान,गेंहू या अन्य उपज भेंट करते थे। समय के साथ जब आर्थिक स्वरूप बदला तो दक्षिणा भी अनाज से मुद्रा में परिवर्तित हो गई। आज यह राशि यजमान की सामर्थ्य अनुसार 50 से 200 रुपये तक होती है,जो केवल भेंट नहीं बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे इस रिश्ते का सम्मान है। राखी और जनेऊ की तैयारी में बदलाव-पूर्व में कुल पुरोहित अपने घरों में ही विविध रंगों के धागों से राखियां और जनेऊ स्वयं तैयार करते थे। यह एक कला थी,जिसमें श्रम और प्रेम का अद्वितीय संगम दिखाई देता था। किंतु आज बाजारवाद और समयाभाव के कारण तैयार राखियां और जनेऊ बाजार से खरीदे जाते हैं,जिन्हें यजमानों को दिया जाता है। जजमानी परंपरा की अटूट डोर आज भी यजमान अपने कुल पुरोहित का वर्ष भर बेसब्री से इंतजार करते हैं,क्योंकि यह मुलाकात केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं,बल्कि आत्मीयता और रिश्तों का उत्सव होती है। यह जजमानी परंपरा,जो सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है,उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवंत प्रेरणा है। देवभूमि के पर्वत,नदियां और गांव आज भी इस बात के साक्षी हैं कि जब कुल पुरोहित और यजमान के बीच राखी और जनेऊ का यह पवित्र सूत्र बंधता है,तो वह केवल कलाई पर नहीं,बल्कि हृदय पर भी एक अमिट छाप छोड़ जाता है,एक ऐसी छाप,जो समय के साथ और भी गहरी होती जाती है।
पुरोहित-यजमान परंपरा देवभूमि में सदियों से अटूट प्रेम और विश्वास का पवित्र सूत्र
