श्रीनगर गढ़वाल। भाद्रपद संक्रांति का पर्व जिसे देवभूमि उत्तराखंड में घी संक्रांति या कुमाऊं में ओलगिया कहा जाता है आज पूरे प्रदेश में हर्षोल्लास और आस्था के साथ मनाया गया। इस दिन गांव-गांव में रोट-प्रसाद बनाए गए,देवालयों में भोग चढ़ा और सामूहिक पूजा-अर्चना के बाद ग्रामीणों ने एक-दूसरे को प्रसाद बांटा। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था ही नहीं,बल्कि प्रकृति,पशुधन और सामूहिकता का भी अनूठा संगम है। घी संक्रांति का सीधा संबंध पशुधन और कृषि से है। इस दिन गाय-बैलों को विशेष आहार,माथे पर तिलक और आशीर्वाद दिया जाता है। लोक मान्यता है कि यह पर्व पशुधन और धरती के प्रति आभार प्रकट करने का अवसर है। लोककवि गुमानी पंत ने कहा था-धान रोपि-रोपि थक्यो मनुज,गाय-बैल बिना काम न चलै। घी रोट संक्रांति ल्यौं,धरती माता धन्य भलै। भाद्रपद संक्रांति पर तैयार होने वाले मोटे रोट-घी और गुड़ से बने केवल प्रसाद नहीं बल्कि सामूहिकता और भाईचारे का प्रतीक हैं। कुमाऊं में इस पर्व को ओलगिया कहा जाता है। इस दिन दामाद,बहनोई,पुरोहित और रिश्तेदारों को दान दिया जाता है। यह परंपरा कृतज्ञता और आशीर्वाद की अद्भुत मिसाल है। लोककवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल ने लिखा है-ओलगिया का दिन आयो,दान-दक्षिणा सब पायो,धरती-गौ माता धन्य हुई,सुख-समृद्धि सब ठायो। पर्व की संध्या पर गांव-गांव में लोकगीत और नृत्य का आयोजन होता है। महिलाएं ढोल-दमाऊं की थाप पर थिरकती हैं,बच्चे लोकधुनों पर उत्साहित होते हैं और बुजुर्ग लोककथाओं में इस पर्व का महत्व सुनाते हैं। एक लोकप्रिय पहाड़ी गीत की पंक्तियां आज भी पर्वतीय घर-आंगन में गूंजती हैं-आज घी संक्रांति रे,रोट-घी को भोग लगौं,देवता धाम रैन बसे,गांव सबै में सुख-शांति छौं। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण और जैविक जीवनशैली की ओर लौटने का आह्वान कर रही है,घी संक्रांति जैसे पर्व हमें यह एहसास कराते हैं कि उत्तराखंड की परंपराएं सदियों पहले से ही इस संतुलन को संजोए हुए हैं। घी संक्रांति केवल धार्मिक पर्व नहीं बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना,पशुधन-प्रेम और सामूहिक जीवन दर्शन का अद्भुत उदाहरण है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि प्रकृति और परंपरा के बीच संतुलन ही सुख-शांति और समृद्धि का आधार है। रोट-प्रसाद की मिठास,घी की सुगंध और सामूहिक आस्था-यही है घी संक्रांति की आत्मा एवं लोकगीत की मधुर तान,यही है देवभूमि उत्तराखंड की पहचान।
देवभूमि उत्तराखंड में घी संक्रांति का उल्लास-लोककला,प्रकृति और परंपरा का अनूठा पर्व
