नारी तुम नारायणी हो-सनातन की चेतना का हुंकार–कवयित्री प्रीति भारती माधव भट्ट


श्रीनगर गढ़वाल सनातन की अनादि परंपरा में नारी सदा से शक्ति,मातृत्व और धैर्य की मूर्ति मानी गई है। जब-जब समाज ने अपने पथ से विचलन किया है,तब-तब नारी ने अपने अस्तित्व का परिचय देकर धर्म और संस्कृति की पताका को ऊंचा किया है। इसी परंपरा को स्वर देती हुई कवयित्री प्रीति भारती माधव भट्ट ने अपनी कविता नारी तुम नारायणी हो,मातृशक्ति का आह्वान किया है। नारी का स्वाभिमान और सनातन की ध्वजा-कविता का संदेश स्पष्ट है-नारी केवल कोमलता का प्रतीक नहीं,बल्कि वह नारायणी है। उसका अस्तित्व स्वयं नारायण से जुड़ा है। कवयित्री बहनों से पुकार करती हैं कि देश की तुम वीरांगना हो,अब सनातन का तुम हुंकार भरो,सनातन का ध्वजा पकड़ कर,जग में इसका प्रचार करो। राम और श्याम से जुड़ी पहचान-अवध की पावन धरती पर रामलला विराजमान हैं। वहीं ब्रज की भूमि श्रीकृष्ण की लीलाओं से अभिसिंचित है। कवयित्री प्रश्न उठाती हैं कि जब रामलला का स्वागत किया गया, तो श्रीश्याम को क्यों भुला दिया जाए। जब रामलला को विराजा है,फिर श्री श्याम को क्यों तजा है। यह प्रश्न केवल आस्था का नहीं बल्कि सनातन की पूर्णता का है,जहां राम और कृष्ण दोनों ही धर्म की मर्यादा और माधुर्य के प्रतीक हैं। नारी-शक्ति का शंखनाद-कवयित्री कहती हैं कि अब समय आ गया है जब बहनें भगवा ध्वजा थामकर अपने अस्तित्व को पहचानें। नारायण ने सदा नारी की रक्षा की है,अब नारी का कर्तव्य है कि वह नारायण को जगत में पुनः विराजमान करे। भगवा का सहारा लेकर,श्री श्याम की बहनों तुम सरताज करो। आस्था और संस्कृति की पुकार-कविता में अयोध्या और मथुरा की गूंज है। यह केवल धार्मिक स्थलों का उल्लेख नहीं,बल्कि सनातन संस्कृति की धड़कन है। अयोध्या धाम पावन है,मथुरा का तुम बहनों आगाज करो,रामलला अब बिराज गये,अब ब्रजराज को राज-सरताज करो। नारी का अंतिम आह्वान-यह रचना केवल कविता नहीं,बल्कि आह्वान है एक शंखनाद,जिसमें नारी से आग्रह है कि वह सनातन ध्वजा की लाज रखे,अपनी आवाज बुलंद करे और विश्व को यह संदेश दे कि-नारी तुम नारायणी हो,अपने अस्तित्व का ख्याल करो,भगवा झंडा आवाज बुलंद कर,नारायण को विराजेंगे का शंखनाद करो। यह कविता नारी के गौरव,सनातन के उत्थान और आस्था के आलोक का संगम है। कवयित्री प्रीति भारती माधव भट्ट की यह रचना निश्चित ही समाज को प्रेरणा देने वाली है।