ड्रोन और सेंसर तकनीक से बचेगा उत्तराखंड का जंगल-देवेन्द्र गौड़ ने जिलाधिकारी को सौंपा संरक्षण का अभिनव प्रस्ताव

श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही वनाग्नि की घटनाओं,जंगलों के विनाश और वन्यजीवों पर मंडरा रहे खतरे को लेकर अब सामाजिक स्तर पर भी गंभीर पहलें तेज होने लगी हैं। वर्षों से पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जागरूकता से जुड़े अभियानों में सक्रिय माध्यमिक वर्ग बालिका एवं महिला क्रिकेट प्रतियोगिता के संस्थापक तथा गांव की बात रेडियो के अध्यक्ष देवेन्द्र गौड़ ने जंगलों को आगजनी से बचाने के लिए आधुनिक तकनीक आधारित व्यवस्था लागू करने की मांग उठाई है। देवेन्द्र गौड़ ने जिलाधिकारी पौड़ी स्वाति एस.भदौरिया एवं गढ़वाल मंडल आयुक्त को ज्ञापन सौंपते हुए जंगलों की सुरक्षा के लिए ड्रोन कैमरे,सेंसर सिस्टम और निगरानी तकनीक के व्यापक उपयोग का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते आधुनिक तकनीक को वन संरक्षण से नहीं जोड़ा गया तो उत्तराखंड के जंगल,वन्यजीव और प्राकृतिक जलस्रोत लगातार खतरे में पड़ते जाएंगे। उन्होंने कहा कि विगत कई वर्षों से वह मुख्यमंत्री,विभिन्न जिलाधिकारियों और उपजिलाधिकारियों को पत्र भेजकर वनाग्नि रोकथाम,वन्यजीव संरक्षण और आगजनी करने वालों की पहचान के लिए ड्रोन कैमरे एवं सेंसर आधारित निगरानी प्रणाली लागू करने की मांग करते आ रहे हैं। उनका मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में फैले विशाल जंगलों की निगरानी केवल पारंपरिक तरीकों से संभव नहीं है,इसलिए आधुनिक तकनीक का उपयोग समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है। देवेन्द्र गौड़ ने बताया कि उन्होंने पूर्व में जिलाधिकारी रुद्रप्रयाग को भी इस संबंध में सुझाव पत्र दिया था,जिसके बाद हाल ही में जखोली रेंज के कुमड़ी गांव में आगजनी करने वाले एक युवक की पहचान कर उसे पकड़ा गया। उन्होंने कहा कि यदि तकनीकी निगरानी और कड़ी कार्रवाई का प्रभावी तंत्र विकसित किया जाए तो जंगलों में आग लगाने जैसी घटनाओं पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है। उन्होंने आगजनी करने वालों के खिलाफ कठोर से कठोर दंडात्मक कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं,बल्कि जल,जंगल,जमीन,वन्यजीव और मानव जीवन के अस्तित्व का आधार हैं। यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे तभी पर्यावरण संतुलन और पहाड़ों का भविष्य सुरक्षित रह सकेगा। जिलाधिकारी स्वाति एस भदौरिया ने भी इस सुझाव को गंभीर और उपयोगी पहल बताते हुए कहा कि वास्तव में यदि जंगलों और वन्यजीवों को सुरक्षित रखना है तो आधुनिक तकनीक आधारित निगरानी प्रणाली बेहद प्रभावी साबित हो सकती है। उन्होंने कहा कि ज्ञापन में पर्यावरण संरक्षण,जल स्रोतों की सुरक्षा,वन्यजीव संरक्षण और आमजन की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदु शामिल हैं, जिन पर गंभीरता से विचार कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। इस दौरान अभियान से जुड़ी महिलाओं ने भी वन संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम की सदस्या अमृता बहुगुणा,सीमा कपरवाण,कांता भण्डारी और चंद्रकला बंगवाल ने कहा कि जब तक जंगलों की निगरानी के लिए ड्रोन कैमरे और सेंसर सिस्टम जैसी आधुनिक तकनीक लागू नहीं होगी,तब तक हर वर्ष जंगल धधकते रहेंगे और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता रहेगा। उन्होंने कहा कि संरक्षित जंगल-सुरक्षित जीवन अभियान को केवल गढ़वाल मंडल तक सीमित नहीं रखा जाएगा,बल्कि पूरे उत्तराखंड के दोनों मंडलों और जिलों में जाकर लोगों को जागरूक किया जाएगा। महिलाओं ने कहा कि यह केवल पर्यावरण बचाने का अभियान नहीं,बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखने की मुहिम है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य में जंगलों की सुरक्षा के लिए अब तकनीक आधारित निगरानी,जनभागीदारी और कठोर कानूनी कार्रवाई तीनों को साथ लेकर चलना आवश्यक हो गया है। लगातार बढ़ती वनाग्नि की घटनाओं ने जहां वन संपदा और वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाया है,वहीं जलस्रोतों,जैव विविधता और ग्रामीण जीवन पर भी गंभीर प्रभाव डाला है। ऐसे में देवेन्द्र गौड़ और उनकी टीम द्वारा उठाई गई यह पहल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक दूरदर्शी और महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है,जो आने वाले समय में राज्य स्तर पर एक व्यापक जनजागरूकता अभियान का रूप ले सकती है।
