राज्य
पांच भाषाओं में लोकजीवन की अमूल्य धरोहर समेटे पंचवेणी कोश संग्रह का भव्य विमोचन श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड की लोकभाषा,लोक-संस्कृति और लोक साहित्य की समृद्ध परंपरा को संरक्षित करने की दिशा में रविवार को श्रीक्षेत्र श्रीनगर में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक अध्याय जुड़ा। हिमालयन साहित्य एवं कला परिषद चैरिटेबल ट्रस्ट श्रीनगर के तत्वावधान में साहित्यकार डॉ.प्रकाश चमोली द्वारा रचित पंचवेणी कोश संग्रह पुस्तक का भव्य विमोचन किया गया। यह कृति उत्तराखंड की लोकभाषाओं में पीढ़ियों से प्रचलित मुहावरों,लोकोक्तियों एवं कहावतों को पांच भाषाओं-गढ़वाली,कुमाऊनी,संस्कृत,हिंदी और अंग्रेजी के संदर्भों के साथ प्रस्तुत करती है। साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गरिमा से ओत-प्रोत कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चार,मंगलाचरण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। वंदे मां पुरुषोत्तम,दैणा हुय्या खोली का गणेश,दैणा हुय्या मोरी का नारायण तथा मेरा गढ़देशा जैसे गढ़वाली गीतों की प्रस्तुतियों ने वातावरण को लोकसंस्कृति के रंग में रंग दिया। ऋषिकेश से पहुंचे कलाकारों ने पारंपरिक सांस्कृतिक वाद्ययंत्रों की मनोहारी प्रस्तुति देकर समारोह में चार चांद लगा दिए। कार्यक्रम का कुशल संचालन कविराज नीरज नैथानी ने किया। पुस्तक विमोचन के मुख्य अतिथि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय देवप्रयाग के निदेशक पीबीबी सुब्रमण्यम रहे,जबकि जिला पंचायत अध्यक्ष रुद्रप्रयाग पूनम कठैत विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता मुख्य ट्रस्टी प्रो.उमा मैठाणी,अतिविशिष्ट अतिथि डॉ.विष्णुदत्त कुकरेती,कुमाऊनी साहित्यकार कृपाल सिंह शील, गढ़वाल विश्वविद्यालय लोककला एवं निष्पादन संस्कृत परिषद के निदेशक गणेश कुकशाल गणी,आचार्य भास्करानंद अणथ्वाल,पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष कृष्णानंद मैठाणी,अनिल स्वामी,दिनेश जोशी,जसपाल गुसाईं,प्रवेश चमोली सहित अनेक साहित्यकार,शिक्षाविद् एवं संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे। पंचवेणी कोश संग्रह को केवल एक पुस्तक नहीं,बल्कि उत्तराखंड की लोकस्मृति,जनअनुभव और भाषाई विरासत को सहेजने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जा रहा है। लोक साहित्य की सृजनधारा सृष्टि के उद्भव के साथ ही मानव जीवन के साथ प्रवाहित होती रही है। लोकगीत,लोकगाथा,लोककथा और लोकनाट्य के साथ प्रकीर्ण लोक साहित्य में मुहावरों,पहेलियों और कहावतों का विशेष महत्व रहा है। डॉ.प्रकाश चमोली ने उत्तराखंड के आंचलिक समाज में पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रचलित अनेक दुर्लभ लोकोक्तियों,मुहावरों और कहावतों को संकलित कर उन्हें व्यापक भाषाई संदर्भ प्रदान किया है। इस कृति की विशेषता यह है कि गढ़वाली एवं कुमाऊनी लोकभाषा में प्रचलित कथनों को हिंदी,संस्कृत और अंग्रेजी में उनके समानार्थी अथवा भाव-साम्य वाले कथनों के साथ सुंदर ढंग से समायोजित किया गया है। इस दृष्टि से यह पुस्तक न केवल लोकभाषा के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण है,बल्कि विभिन्न भाषाओं के बीच संवाद स्थापित करने वाली साहित्यिक कड़ी के रूप में भी सामने आती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता मुख्य ट्रस्टी प्रो.उमा मैठाणी ने पुस्तक की विशेषताओं एवं इसके साहित्यिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। गणेश कुकशाल गणी,शिक्षक शिव सिंह नेगी,डॉ.विमल चौहान,कुमाऊनी साहित्यकार कृपाल सिंह शील तथा वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.विष्णुदत्त कुकरेती ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए पंचवेणी कोश संग्रह को लोकभाषा और लोकसाहित्य के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कृति बताया। पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष कृष्णानंद मैठाणी ने भी पुस्तक की उपयोगिता पर विचार व्यक्त किए और लेखक के प्रयास की सराहना की। जिला पंचायत अध्यक्ष रुद्रप्रयाग पूनम कठैत ने डॉ.प्रकाश चमोली को शॉल ओढ़ाकर एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। अपने संबोधन में उन्होंने लोकभाषा और संस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए ऐसे साहित्यिक प्रयासों को आवश्यक बताया। पुस्तक विमोचन समारोह में सबसे भावुक और आत्मीय दृश्य उस समय देखने को मिला जब डॉ.प्रकाश चमोली के मूल गांव मरगांव बचणस्यू से पहुंची महिला मंगल दल की सदस्यों ने उन्हें शॉल ओढ़ाकर एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। बचणस्यू मंडाण ग्रुप के अंकित रावत और जसपाल गुसाईं ने भी लेखक का सम्मान किया। कविराज नीरज नैथानी,अजब सिंह रावत,उम्मेद सिंह मेहरा,दिनेश प्रसाद डिमरी,राजकीय इंटर कॉलेज खंदूखाल के शिक्षक-कर्मचारियों तथा श्रीराम ज्वेल्स के संचालक राजीव विश्नोई ने डॉ.चमोली का स्वर्णजड़ित मुकुट,शॉल एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर तथा पुष्पवर्षा कर अभिनंदन किया। अपने संबोधन में डॉ.प्रकाश चमोली ने अपनी पुस्तक के विमोचन के अवसर पर श्रीक्षेत्र की पुण्यभूमि को नमन करते हुए मुख्य अतिथि,विशिष्ट अतिथि,साहित्यकारों,विद्वानों और उपस्थित सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि पुस्तक के विमोचन का यह अवसर उनके लिए गौरव और भावुकता से भरा है। डॉ.चमोली ने अपने गांव मरगांव से आई महिला मंगल दल की सदस्यों को वस्त्र भेंट कर सम्मानित किया। इस अवसर पर उनकी मां पवित्रा देवी,धर्मपत्नी मीनाक्षी चमोली,पुत्र वैभव और पुत्री मंजरी,बड़े भाई राधाकृष्ण चमोली सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी मौजूद रहे। मुख्य अतिथि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय देवप्रयाग के निदेशक पीबीबी सुब्रमण्यम ने अपने संबोधन में भाषा और समाज के संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हम समाज के घटक हैं और हमारी अपनी-अपनी भाषाएं हमारी पहचान तथा सांस्कृतिक चेतना की वाहक हैं। उन्होंने लोक-भाषाओं में संरक्षित ज्ञान,अनुभव और जीवन-दर्शन को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के ऐसे प्रयासों की सराहना की। कार्यक्रम में गढ़वाल विश्वविद्यालय के डॉ.भानु प्रसाद नैथानी,प्रो.अनिल नौटियाल,बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमेश चन्द्र जोशी और संरक्षक अनूप पांथरी,जयकृष्ण पैन्यूली,रोटरी क्लब से दिनेश जोशी और अनूप घिल्डियाल,प्रधान मरगांव गुड्डी देवी,पूनम रतूड़ी,सावेत्री देवी वीरेंद्र रतूड़ी,प्रभाकर बाबुलकर,प्रदीप अणथ्वाल,बंटी जोशी,प्रदीप तिवारी सहित शिक्षक संगठन से जुड़े अनेक लोग एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। पंचवेणी कोश संग्रह का विमोचन श्रीनगर की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक धरती पर लोकभाषा के संरक्षण की दिशा में एक उल्लेखनीय पहल के रूप में सामने आया। यह कृति उत्तराखंड की लोकवाणी में संचित अनुभव,हास्य,व्यंग्य,जीवन-दर्शन और सामाजिक चेतना को शब्दों में सहेजते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मूल्यवान भाषाई विरासत प्रस्तुत करती है।

