परिवारों को जोड़ती परंपरा शिव ध्वजा-सिद्धपीठ श्री देवलेश्वर महादेव मंदिर की यह अनूठी परंपरा

श्रीनगर गढ़वाल। पलायन के इस दौर में जब गांव खाली हो रहे हैं,परिवार बिखर रहे हैं और हमारी भाषा-बोली,तीज-त्योहार धीरे-धीरे पीछे छूटते जा रहे हैं,ऐसे समय में देवभूमि की धरती पर एक ऐसी पहल शुरू हुई है जिसने लोगों को फिर से अपनी जड़ों से जोड़ा है। यह पहल है-शिव ध्वजा परंपरा की,जिसे सिद्धपीठ श्री देवलेश्वर महादेव मंदिर समिति ने वर्ष 2016 में प्रारंभ किया था। शिव ध्वजा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि गांवों और परिवारों को पुनः एक सूत्र में बांधने का माध्यम बन गई है। हर वर्ष यह ध्वजा एक नए गांव द्वारा लाई जाती है और इस ध्वजा लाने की प्रक्रिया भी अत्यंत अनूठी है। बैकुंठ चतुर्दशी मेले के दौरान पर्चियां डाली जाती हैं,जिनमें उन गांवों के नाम होते हैं जो अगले वर्ष ध्वजा लाने का दावा करते हैं। जिस गांव का नाम निकलता है,वही अगले वर्ष शिव ध्वजा लाता है। ध्वजा लाने के लिए गांव के हर परिवार की भागीदारी अनिवार्य होती है,साथ ही गांव की विवाहित बेटियों को विशेष रूप से बुलाया जाता है। यह परंपरा इस संदेश के साथ चलती है कि चाहे बेटी कहीं भी हो,उसकी जड़ें अपने गांव और अपने देवता से हमेशा जुड़ी रहती हैं। धूमधाम से निकाली जाने वाली यह शिव ध्वजा पूरे वर्ष बाबा भोलेनाथ को अर्पित रहती है। एक वर्ष के बाद जब नई ध्वजा आती है,तभी पुरानी ध्वजा उतारी जाती है और वह भी उसी गांव द्वारा जिसने उसे चढ़ाया था। शिव ध्वजा की यह परंपरा वर्ष 2016 में उजियाड़ी गांव से शुरू हुई। 48 फीट ऊंची पहली ध्वजा ने इस परंपरा की नींव रखी। इसके बाद हर वर्ष एक नया गांव इस परंपरा को आगे बढ़ाता रहा। 2017-तामलग गांव 54 फीट ऊंची ध्वजा,2018-गहड़ गांव अब तक की सबसे ऊंची 58 फीट ध्वजा,2019-गगवाड़ा गांव लगभग समान ऊंचाई की ध्वजा,2020-कोविड काल में भी परंपरा नहीं टूटी,समिति ने स्वयं 48 फीट की ध्वजा अर्पित की। 2021-बौसरी गांव 50 फीट,2022-धनाऊ गांव 56 फीट,2023-ननकोट गांव 54 फीट,2024-बुडोली गांव 54 फीट,2025-डांग गांव इस बार शिव ध्वजा लाएगा। जब ध्वजा मंदिर परिसर में पहुंचती है,तो सबसे पहले बाबा देवलेश्वर महादेव से आज्ञा ली जाती है कि हे भोलेनाथ नई ध्वजा प्रस्तुत है,कृपया पुरानी ध्वजा उतारने की अनुमति दें। आज्ञा मिलते ही पुरानी ध्वजा उतारी जाती है और नई ध्वजा चढ़ाकर महा आरती के साथ मेले का शुभारंभ होता है। ध्वजा का बदलता स्वरूप एकता के तीन रंग-आठ वर्षों तक शिव ध्वजा केवल सफेद रंग में आती थी,जो बाबा भोलेनाथ की पवित्रता का प्रतीक था। लेकिन वर्ष 2023 में क्षेत्र के धर्माचार्यों की उपस्थिति में एक धर्मसभा आयोजित की गई,जिसमें सर्वसम्मति से ध्वजा का स्वरूप बदला गया। अब शिव ध्वजा तीन रंगों में आती है-पीला: प्रथम पूज्य गणपति को समर्पित,सफेद: भोलेनाथ की पवित्रता का प्रतीक,लाल: माता पार्वती का आशीर्वाद दर्शाता है। तीनों रंगों का यह संयोजन त्रिदेव और त्रिशक्ति की एकता का प्रतीक है,जो इस परंपरा को और भी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक गहराई प्रदान करता है। गांवों को जोड़ने वाली ध्वजा संस्कृति को सहेजने का पर्व शिव ध्वजा आज केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं,बल्कि गांवों के पुनर्जागरण का उत्सव बन चुकी है। यह परंपरा उस सामाजिक ताने-बाने को फिर से मजबूत कर रही है,जो पलायन की वजह से कमजोर पड़ता जा रहा था। हर वर्ष जब गांव के लोग,बेटियां और परदेसी एक साथ जुटते हैं,तो यह केवल एक ध्वजा नहीं,बल्कि एकता,आस्था और अपनी मिट्टी से जुड़ाव का प्रतीक बन जाती है। आइए बनें साक्षी इस वर्ष की शिव ध्वजा के इस वर्ष 1 नवंबर 2025 को जब डांग गांव की शिव ध्वजा मंदिर परिसर में पहुंचेगी,तब एक बार फिर पूरे क्षेत्र में हर-हर महादेव के जयघोष गूंजेंगे। यह केवल ध्वजा नहीं होगी,यह उस आस्था का प्रतीक होगी जो गांवों,परिवारों और पीढ़ियों को जोड़ रही है।