
मोदी सरकार द्वारा लाए गए 4 श्रमिक विरोधी कानूनों को आज से लागू करने के विरोध में श्रमिक संगठनों ने श्रमिक संयुक्त मोर्चा के बैनर तले मनाया “काला दिवस”, गांधी पार्क में सभा कर श्रम कोड्स की प्रतियां फूंकी।
इस दौरान हुई सभा को सम्बोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि ट्रेड यूनियनें लगातार इन श्रम-विरोधी, नियोक्ता-समर्थक श्रम संहिताओं का विरोध करती रही हैं, जिन्हें तथाकथित ‘श्रम सुधार’ और “Ease of Doing Business” के नाम पर लाया गया है। 12 फरवरी की ऐतिहासिक आम हड़ताल के बाद भी केंद्र सरकार इन श्रम संहिताओं को वापस लेने या इस मुद्दे पर केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ कोई सार्थक बैठक करने से बच रही है।
इसके अलावा, इन संहिताओं के मसौदा तैयार करने के चरण से ही ट्रेड यूनियनों जैसे हितधारकों से कोई परामर्श नहीं किया गया। इतने गंभीर मुद्दे पर, जो देश के कार्यबल के जीवन से जुड़ा है, लंबे समय से भारतीय श्रम सम्मेलन भी नहीं बुलाया गया। यह अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का उल्लंघन है, जिनके प्रति भारत एक राष्ट्र के रूप में प्रतिबद्ध है।
ये श्रम संहिताएँ देश के श्रमिकों-जो संपत्ति के वास्तविक सृजनकर्ता हैं-को फिर से ब्रिटिश औपनिवेशिक काल जैसी शोषणकारी परिस्थितियों में धकेलने का प्रयास हैं। श्रमिक वर्ग ने औपनिवेशिक काल में अत्यधिक शोषण के खिलाफ और स्वतंत्र भारत में भी 8 घंटे के कार्यदिवस, कार्यस्थल सुरक्षा
यूनियन बनाने और संगठित होने के अधिकार, सामूहिक सौदेबाजी, आंदोलन ब करने और हड़ताल के अधिकार के लिए संघर्ष किया है। उन्होंने सम्मानजनक वेतन, सामाजिक सुरक्षा, ठेका श्रमिकों के नियमितीकरण, स्थायी कार्यों में ठेका प्रथा समाप्त करने, समान काम के लिए समान वेतन, बोनस, ग्रेच्युटी और पेंशन के अधिकार के लिए भी लड़ाई लड़ी है।
हमने 1926 के ट्रेड यूनियन अधिनियम के माध्यम से यूनियन बनाने के अधिकार को वैधानिक मान्यता दिलाई। ब्रिटिश काल में हमारे पूर्वजों के संघर्ष से कई श्रम कानून बने, और स्वतंत्र भारत में संसद द्वारा कुल 44 केंद्रीय श्रम कानून तथा राज्यों द्वारा लगभग 150 कानून बनाए गए, क्योंकि श्रम भारतीय संविधान की समवर्ती सूची में शामिल है। ये सभी उपलब्धियाँ लगभग 150 वर्षों के संघर्ष का परिणाम हैं।
वर्तमान केंद्र सरकार इन श्रम संहिताओं के माध्यम से इन उपलब्धियों को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इन संहिताओं में ऐसे कठोर और दमनकारी प्रावधान हैं, जिनसे यूनियन बनाना कठिन, पंजीकरण मुश्किल और निरस्तीकरण आसान हो जाएगा। नियोक्ताओं के उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जा रहा है, जबकि ट्रेड यूनियन गतिविधियों को दंडनीय बनाया जा रहा है। कार्य समय की सीमा को खुला छोड़ दिया गया है, जिससे उसे मनमाने ढंग से बढ़ाया जा सके। हड़ताल का अधिकार लगभग समाप्त कर दिया गया है।
फिक्स्ड टर्म रोजगार को सामान्य बनाया जा रहा है, मौजूदा सामाजिक सुरक्षा कानूनों को कमजोर किया जा रहा है और सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा. के झूठे दावे के बावजूद अधिक श्रमिकों को इसके दायरे से. बाहर रखा जा रहा है।
सभा के पश्चात बाटा चौक पर श्रम कोड्स की प्रतियां भी फूंकी गई।
सभा को भाकपा( माले) जिला सचिव ललित मटियाली, इंकलाबी मजदूर केंद्र के शहर सचिव कैलाश भट्ट, दिनेश, सीएसटीयू के धीरज कुमार, बजाज मोटर कर्मकार यूनियन के अध्यक्ष हीरा राठौर, बेलराइज वर्कर्स यूनियन के साहेब सिंह, ऑटोलाइन के जीवन लाल, एडिएंट कर्मकार यूनियन के चंदन गोस्वामी , राने मद्रास एम्प्लाइज यूनियन के राहुल चौहान ने संबोधित किया।
संचालन दिनेश तिवारी ने किया।
इस दौरान मूल निवासी संघ के अमर सिंह, ऐक्टू जिला सचिव अनिता अन्ना, सुब्रत विश्वास, राजीव कुमार, नागेन्द्र यादव, मुनीब यादव, गणेश बोरा, महेश कोठारी, संतोष गुप्ता, नरेश कुमार, विजय शर्मा, रंजन विश्वास आदि थे।
