नाट्य प्रस्तुति विरासत की भूरि-भूरि प्रशंसा प्रतिभागियों को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रशस्तिपत्र

श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केन्द्र में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के एक्सटेंशन डिपार्टमेंट की परियोजना के अंतर्गत आयोजित तीस दिवसीय नाट्य कार्यशाला के बाद महेश एलकुंचवार के चर्चित नाटक विरासत का मंचन किया गया। इस नाट्य प्रस्तुति में जीवंत अभिनय,प्रभावशाली संवाद और सशक्त मंच प्रस्तुति ने दर्शकों की खूब सराहना बटोरी। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तत्वावधान में आयोजित यह तीस दिन की कार्यशाला केन्द्र के सहायक निदेशक महेंद्र सिंह पंवार के निर्देशन में आयोजित की गई। तीस दिवसीय कार्यशाला में प्रतिभागियों को अभिनय तथा रंगमंच की विभिन्न रचनात्मक एवं तकनीकी विधाओं का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया,जिसका प्रभाव विरासत की सफल प्रस्तुति में स्पष्ट दिखाई दिया। कार्यशाला के दौरान तैयार की गई इस नाट्य प्रस्तुति का निर्देशन भी पंवार द्वारा किया गया। इस नाटक में सभी कलाकारों ने अपने अभिनय से पात्रों को प्रभावी ढंग से जीवंत किया और दर्शकों को प्रस्तुति से जोड़े रखा। यह नाट्य प्रस्तुति केन्द्र के प्रेक्षागृह में लगातार दो दिन प्रस्तुत की गई। विरासत नाटक नाटककार महेश एल्कुंचवार द्वारा लिखित समकालीन भारतीय रंगमंच की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सशक्त कृति है। यह नाटक परिवार,परंपराओं, पीढ़ीगत बदलावों और भौतिक संपत्ति व मानवीय मूल्यों के बीच के अंतरद्वंद्व को गहराई से रेखांकित करता है। यह इस बात को जीवंत रूप से प्रस्तुत करता है कि कैसे बदलते सामाजिक और पारिवारिक परिवेश के साथ रिश्तों में धीरे-धीरे दूरी,स्वार्थ और वैचारिक मतभेद पनपने लगते हैं। अपने जीवंत पात्रों और प्रभावशाली संवादों के माध्यम से यह नाटक विरासत के वास्तविक अर्थ पर सवाल उठाता है। यह संदेश देता है कि हमारी सबसे बड़ी विरासत धन या संपत्ति नहीं,बल्कि हमारे संस्कार,संवेदनशीलता,संस्कृति और आत्मीय संबंध हैं। नाटक का प्रत्येक पात्र जीवन की जटिलताओं का सामना अपने अनूठे दृष्टिकोण से करता है,जो इस कहानी को बेहद यथार्थवादी और भावुक बना देता है। अपनी सरल भाषा,गहन मानवीय संवेदना और मजबूत नाटकीय संरचना के साथ ‘विरासत दर्शकों को अपने स्वयं के जीवन और संबंधों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करता है। यह हमें याद दिलाता है कि यदि हमने अपने नैतिक मूल्यों और इंसानियत को सहेजकर नहीं रखा,तो हमारी सबसे अनमोल विरासत धीरे-धीरे मिट जाएगी। नाटक में दादी की भूमिका अपर्णा सेमवाल,आई-पारुल तोमर,भास्कर-शिवम सिंह,वहिनी-प्रीति रावत,सुधीर-रोहन गुप्ता प्रभा-प्राची,अंजलि-मौली दानू,चंदू-शुभम वर्मा,पराग-आदित्य भट्ट,रंजू-मेघा ध्यानी,भीवा-नितिन सिंह और मास्साब की भूमिका प्रशांत थपलियाल ने निभाई। इस नाट्य प्रस्तुति में ध्वनि संयोजक-अंकित भट्ट,प्रकाश व्यवस्था-अरविंद टम्टा,मंच अभिकल्पना-चैतन्य सोलणकर,वेशभूषा उपासना भट्ट,मंच सज्जा-जयेंद्र,सूरज कुमार,रूपसज्जा-अभिषेक बहुगुणा,उपासना भट्ट,सहायक निर्देशक-अंकित भट्ट तथा परिकल्पक एवं निर्देशक महेंद्र सिंह पंवार का था। इस नाट्य प्रस्तुति के उपरांत विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता छात्र कल्याण डॉ.ओ.पी.गुसाईं ने कहा कि यह नाट्य प्रस्तुति पेशेवराना तरीके से प्रस्तुत की गई। कलाकारों ने अपने-अपने पात्रों को जिया इसीलिए यह नाटक अपने उत्कर्ष तक पहुंचा। डॉ.गुसाईं ने नाटक के निर्देशक महेंद्र सिंह पंवार की पीठ थपथपाते हुए कहा कि उनका कार्य मंच में सबके सामने दिख रहा है यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। कार्यक्रम के अंत में नाटक के निर्देशक महेंद्र सिंह पंवार ने इस सफल आयोजन के लिए अपने विभाग के निदेशक गणेश खुगशाल गणी और उपनिदेशक डॉ.संजय पांडे के साथ-साथ समस्त विश्वविद्यालय परिवार के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कार्यशाला और प्रस्तुति के लिए मिले सहयोग को टीम की सफलता में महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम में केंद्र के संस्थापक निदेशक डॉ.डी.आर.पुरोहित,हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ.राहुल बहुगुणा,डॉ.कपिल पंवार,कवि चित्रकार जयकृष्ण पैन्यूली,नगर निगम के पार्षद शुभम प्रभाकर सहित अनेक शिक्षक,रंगकर्मी,गणमान्य नागरिक और दर्शक उपस्थित रहे।
