श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर आचार्य शिवप्रसाद ममगांई का संदेश-निंदा,प्रशंसा में समभाव ही जीवन की सच्ची साधना

 

 

 

श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरा,मां गंगा की प्रमुख सहायक अलकनंदा नदी के निकट बसी धार्मिक एवं आध्यात्मिक नगरी श्रीनगर गढ़वाल में इन दिनों श्रीमद्भागवत महापुराण कथा की अमृतधारा प्रवाहित हो रही है। स्वर्गीय मोहन लाल जोशी की पुण्य स्मृति में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के चतुर्थ दिवस बुधवार 21 अक्टूबर 2026 को ज्योतिषपीठ व्यास पद से अलंकृत आचार्य शिवप्रसाद ममगांई ने अपने ओजस्वी एवं ज्ञानवर्धक प्रवचनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को गुरु की महिमा,पारिवारिक संस्कारों,समभाव,सदाचार और आत्मचिंतन का संदेश दिया। कथा स्थल पर भक्तिमय वातावरण के बीच श्रद्धालुओं ने श्रीमद्भागवत के आध्यात्मिक प्रसंगों का श्रवण कर धर्म और जीवन के गूढ़ सिद्धांतों को समझा। यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है,बल्कि स्वर्गीय मोहन लाल जोशी की पुण्य स्मृति को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के साथ ही समाज में आध्यात्मिक चेतना,पारिवारिक एकता और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने का माध्यम भी बन रहा है। श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा मनुष्य को जीवन के वास्तविक उद्देश्य का बोध कराती है और उसे सत्य,धर्म,प्रेम,करुणा तथा सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। चतुर्थ दिवस की कथा में आचार्य शिवप्रसाद ममगांई ने गुरु के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन में गुरु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। गुरु का मार्गदर्शन मनुष्य को सही और गलत के बीच अंतर समझने की दृष्टि प्रदान करता है। गुरु केवल ज्ञान देने वाला नहीं,बल्कि जीवन को संस्कारित करने और आध्यात्मिक उन्नति की राह दिखाने वाला पथप्रदर्शक होता है। मनुष्य को अपने जीवन में गुरु के प्रति श्रद्धा,विश्वास और सम्मान का भाव बनाए रखना चाहिए। उन्होंने पारिवारिक जीवन में आराध्य के प्रति श्रद्धा और आस्था की महत्ता को भी समझाया। परिवार में अपने इष्ट के प्रति एकनिष्ठ भाव रखने तथा घर के पूजा स्थल को श्रद्धा और साधना का केंद्र बनाने की प्रेरणा दी। उनके संदेश का मूल भाव यह रहा कि पूजा-पाठ का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक कर्मकांड करना नहीं,बल्कि मन को निर्मल बनाना,विचारों में पवित्रता लाना और व्यवहार में सद्गुणों को अपनाना है। आचार्य ममगांई ने सामाजिक व्यवहार पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य को दूसरों के मान-सम्मान अथवा उपेक्षा के आधार पर अपना व्यवहार नहीं बदलना चाहिए। जो लोग सम्मान देते हैं,उनके प्रति विनम्र रहना सरल है,लेकिन जो सम्मान नहीं देते,उनके साथ भी समानता,धैर्य और मर्यादा का व्यवहार करना ही वास्तविक संस्कारों की पहचान है। उन्होंने जीवन में निंदा और प्रशंसा को सहज भाव से स्वीकार करने की सीख देते हुए समझाया कि व्यक्ति को दूसरों की बातों से अत्यधिक प्रभावित होकर अपने मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए। प्रशंसा मिलने पर अहंकार और आलोचना होने पर निराशा से बचना चाहिए। जीवन में संतुलन बनाए रखने वाला व्यक्ति ही कठिन परिस्थितियों में अपने विवेक और धैर्य को कायम रख सकता है। प्रवचन के दौरान आचार्य ने निंदा और आलोचना के विषय को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने संदेश दिया कि मनुष्य को आलोचना से घबराने के बजाय उसके पीछे छिपे सत्य को समझने का प्रयास करना चाहिए। यदि आलोचना उचित हो तो उससे सीख लेकर स्वयं में सुधार करना चाहिए और यदि वह निराधार हो तो संयम के साथ अपने कर्तव्य-पथ पर आगे बढ़ते रहना चाहिए। उन्होंने जीवन में आने वाली चुनौतियों के प्रति सजग रहने की आवश्यकता पर भी बल दिया। विपरीत परिस्थितियां और आलोचनाएं मनुष्य को आत्ममंथन करने तथा अपनी कमजोरियों को पहचानने का अवसर देती हैं। इसलिए व्यक्ति को निंदा और प्रशंसा,दोनों परिस्थितियों में संतुलित रहकर अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए। कथा के दौरान घर के पूजा स्थल तथा मां लक्ष्मी,मां सरस्वती और भैरव की तस्वीरों के संबंध में भी चर्चा हुई। आचार्य ने धार्मिक आस्था,पूजा-पद्धति और घर के मंदिर की मर्यादा के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि पूजा स्थल को स्वच्छ,शांत और व्यवस्थित रखें तथा देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव बनाए रखें। धार्मिक परंपराओं का उद्देश्य मनुष्य के भीतर सकारात्मकता,अनुशासन और आध्यात्मिक चेतना का विकास करना है। घर का मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं,बल्कि परिवार के सदस्यों को संस्कार,संयम,सद्भाव और ईश्वर के प्रति आस्था से जोड़ने वाला पवित्र केंद्र होता है। स्वर्गीय मोहन लाल जोशी की पुण्य स्मृति में आयोजित इस श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के माध्यम से श्रद्धालुओं को धर्म,भक्ति और जीवन मूल्यों से जुड़ने का अवसर मिल रहा है। कथा के प्रत्येक दिवस में दिए जा रहे आध्यात्मिक संदेश लोगों को अपने जीवन,व्यवहार और पारिवारिक संबंधों पर आत्मचिंतन करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। आयोजन परिवार में राजेश्वरी जोशी पूर्व जिला पंचायत सदस्य,चिलेड़ी-बड़ियारगढ़,उनके पुत्र मनोज जोशी,ग्राम प्रधान सुपर-बड़ियारगढ़,अनुज जोशी अध्यक्ष गौ सेवा संवर्धन समिति एवं अध्यक्ष श्रीनगर व्यापार सभा तथा पौत्र संजय जोशी सहित परिवार के सदस्य आयोजन से जुड़े हैं। परिवार की ओर से श्रद्धालुओं को कथा श्रवण करने और इस पुण्य कार्य में सहभागी बनने के लिए आमंत्रित किया गया है। श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में विद्वान पंडित आचार्य महेश भट्ट,पंडित संदीप बहुगुणा,पंडित हिमांशु मैठाणी,पंडित अंकित केमिनी एवं पंडित अनिल चमोली की उपस्थिति से धार्मिक आयोजन की गरिमा और आध्यात्मिक महत्ता बढ़ रही है। इस अवसर पर प्रताप भंडारी पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य चौरास,नंदा गैरोला,जसोदा गोदियाल,देवी प्रसाद गोदियाल,प्रेमा मलासी,राजेंद्र प्रसाद,टीक गैरोला,शुभम रागड़,मधुसूदन सेमवाल,राजाराम जोशी सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे। श्रीमद्भागवत कथा का संदेश यही है कि मनुष्य अपने जीवन में गुरु के मार्गदर्शन को महत्व दे,मान-सम्मान की अपेक्षाओं से ऊपर उठकर समान व्यवहार करे और निंदा-प्रशंसा के बीच अपने विवेक तथा धैर्य को बनाए रखे। जब धर्म केवल सुनने तक सीमित न रहकर आचरण में उतरता है,तभी वह व्यक्ति,परिवार और समाज के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का आधार बनता है।