Tuesday 24/ 02/ 2026 

Bharat Najariya
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उत्तराखण्ड

बैकुंठ चतुर्दशी मेले की चौथी संध्या में सवाई भाट की सुरीली आवाज से भक्ति और बॉलीवुड सुरों से गूंज उठा श्रीनगर

श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि श्रीनगर में चल रहे ऐतिहासिक बैकुंठ चतुर्दशी मेले की चौथी संध्या एक अविस्मरणीय संगीतमय अनुभव बन गई। प्रसिद्ध गायक एवं इंडियन आइडल फेम सवाई भाट ने अपनी अद्भुत आवाज से ऐसा जादू बिखेरा कि पूरा मैदान भक्ति और संगीत की सुरमई लहरियों में डूब गया। कार्यक्रम की शुरुआत सवाई भाट ने अपने प्रसिद्ध गीत केसरिया बालम पधारो म्हारे देश से की,जिसने पलभर में ही वातावरण को लोकसंगीत की सुगंध से भर दिया। इसके बाद उन्होंने तेरे बिन नहीं जीना ढोलना,मेरे रश्के कमर,तेरी पहली नजर जैसे लोकप्रिय गीतों से दर्शकों को रोमांचित कर दिया। भक्ति रस से ओतप्रोत भजनों-श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम और ओ पलकें झुकाओ ना-ने माहौल को भक्तिमय बना दिया। सवाई भाट ने जब मंच से उतरकर दर्शकों के बीच पहुंचकर गीत प्रस्तुत किया,तो पूरा मैदान तालियों की गूंज और जयघोष से थर्रा उठा। सवाई भाट के सुरों पर बच्चे,युवा और बुजुर्ग सभी झूमते नजर आए। दर्शक देर रात तक उनकी गायकी में खोए रहे। श्रीनगर का आवास विकास मैदान रोशनी और संगीत से जगमगा उठा। सवाई भाट ने कहा गढ़वाल की पावन धरती पर गाना मेरे लिए गर्व की बात है। यहां की संस्कृति,श्रद्धा और लोगों का प्रेम मेरे लिए अमूल्य है। कार्यक्रम के अंत में नगर निगम श्रीनगर की मेयर आरती भण्डारी ने सभी कलाकारों और अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि बैकुंठ चतुर्दशी मेला केवल एक उत्सव नहीं,बल्कि हमारी लोकसंस्कृति का जीवंत प्रतीक है। ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी अपने संस्कारों और परंपराओं से जुड़ी रहती है। उन्होंने बताया कि मेले में आने वाले दिनों में भी और भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे,जिनमें स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर के कलाकार प्रस्तुति देंगे। कार्यक्रम में नगर आयुक्त नूपुर वर्मा,पार्षदगण,स्थानीय जनप्रतिनिधि,अधिकारी-कर्मचारी एवं हजारों की संख्या में श्रद्धालु और संगीतप्रेमी उपस्थित रहे। रात्रि का अंत भक्ति और संगीत के समन्वय से उस क्षण में बदल गया जब सवाई भाट के सुरों के साथ पूरा श्रीनगर एकसाथ झूम उठा-मानो बैकुंठ चतुर्दशी मेला केवल एक आयोजन नहीं,बल्कि देवभूमि की आत्मा की गूंज बन गया हो। सवाई भाट की यह प्रस्तुति न केवल संगीत प्रेमियों के लिए,बल्कि गढ़वाल की सांस्कृतिक विरासत के लिए भी एक स्मरणीय अध्याय बन गई-एक ऐसी रात,जहां भक्ति,प्रेम और लोकधुनों ने मिलकर सुरों की गंगा बहा दी।

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