
अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन(एपवा) ने महिलाओं के संघर्षों को याद करते हुए गोष्ठी की और महिला कामगारों को अधिकार व सम्मान देने की की मांग करते हुए गोष्ठी की।
एपवा संयोजक शोभना ने गोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का इतिहास मार्च 1908 में महिला मजदूर आंदोलन, 28 फरवरी 1909 में महिला मजदूर आंदोलन , 1910 में डेनमार्क में महिलाओं के सम्मेलन, 8 मार्च 1914 को युद्ध के खिलाफ यूरोप की महिलाओं का प्रदर्शन और 8 मार्च 1917 को देश को बर्बाद और नरसंहार में बदल देने वाले युद्ध के खिलाफ रूस की कामगार महिलाओं की हड़ताल में निहित है। “रोटी और शांति” के लिए कि गई हड़ताल ने रूस के जार का तख्तापलट कर दिया।
8 मार्च 1913 से हर साल अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह दिवस कामकाजी महिलाओं के अपने अधिकारों को पाने के संघर्ष को याद करने और महिलाओं के प्रति होने वाले शोषण के खिलाफ चलने वाले संघर्षों के दिवस में मनाया जाता हैं।
बार काउंसिल सदस्य अमनदीप कौर ने कहा कि जिन अधिकारों को पाने के लिए महिलाओं ने लंबी लड़ाई लड़ी और उन संघर्षों को याद करते हुए महिला दिवस मनाया जाता है आज पूंजीवादी व साम्राज्यवादी सरकारें उन अधिकारों पर फिर से डाका डाल रही हैं। कामकाजी महिलाओं ने 8 घंटे काम की लड़ाई लड़ी थी। लेकिन आज सरकार पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए मजदूरों को फिर से नए श्रम कानून लाकर 12–12 घंटे काम करवा रही है। 8 मार्च 1914 और 1917 में युद्ध के खिलाफ महिलाओं ने हड़ताल की थी आज अमरीका की साम्राज्यवादी नीतियों ने फिर से पूरी दुनिया को युद्ध में झौंक दिया है। जिसका सबसे बड़ा नुकसान अंततः इस दुनिया की आधी आबादी यानी औरतों को उठाना पड़ेगा।
प्रीति मौर्य ने कहा कि महिलाओं को हमारे समाज में शुरू से ही निर्जीव वस्तु या संपत्ति के तौर पर पुरुषवादी समाज द्वारा प्रस्तुत किया जाता रहा है। महिलाओं ने लड़ भीड़ कर कुछ आजादी हासिल भी की है। लेकिन तमाम कोशिशों और संघर्षों के बावजूद भारत में महिलाओं की सामाजिक स्थिति दोयम दर्जे की है। महिलाओं को अभी भी बराबरी हासिल नहीं है। समाज अभी भी पितृसत्ता और पुरूषवाद से जकड़ा हुआ है। समाज में महिलाओं को नीचा दिखाने के लिए तमाम तरह के मुहावरे और माॅ बहन की गालियां तक गढ़ी गयी हैं।
जिससे उन्हें हर जगह अपमानित व भेदभाव किया जाता है।
उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन की जिला उप सचिव अनिता अन्ना ने कहा कि महिलाओं को न तो उद्योगों में बराबर का वेतन दिया जाता है न ही सरकारी विभाग में। आशा– आंगनबाड़ी– भोजनमाता जैसे स्कीम वर्कर्स का सरकार खुद ही शोषण करती है। उन्हें न तो राज्य कर्मचारी का दर्ज प्राप्त है और न ही न्यूनतम वेतन। आशा वर्कर्स पर स्वास्थ्य विभाग सहित अन्य विभागों के भी काम सौंप दिए जाते हैं। परन्तु न तो उन्हें वेतन मिलता है न ही मान– सम्मान। लंबे समय से वे राज्य कर्मचारी का दर्ज देने की मांग पर आंदोलनरत हैं।
गोष्ठी में अमनदीप कौर, शोभना, प्रीति मौर्य, अनिता अन्ना, नीरज कुमारी, अंकिता पासवान, कृतिका, सौम्यता, अर्चना, पुष्पा मौर्य, पूनम, ललित मटियाली, उत्तमदास आदि मौजूद थे।
