शाश्वत धाम लक्ष्मोली में गूंजेगा सनातन का शंखनाद-जेष्ठ माह में भव्य भागवत कथा,सैकड़ों विद्वानों का होगा आध्यात्मिक समागम

श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि श्रीनगर गढ़वाल के समीप स्थित पावन धरा लक्ष्मोली में इस जेष्ठ माह के द्वितीय सप्ताह में सनातन संस्कृति का विराट स्वरूप देखने को मिलेगा। शाश्वत धाम लक्ष्मोली में आयोजित होने जा रही भव्य भागवत कथा न केवल आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बनेगी,बल्कि भारतीय संस्कृति,परंपरा और ज्ञान की गौरवशाली धरोहर को पुनर्जीवित करने का सशक्त माध्यम भी सिद्ध होगी। इस विशेष आयोजन में ऋषिकुल हरिद्वार एवं आचार्य कुलम विद्यालय से सैकड़ों शिक्षक,छात्र-छात्राएं एवं विद्वान भाग लेंगे। भागवत कथा के माध्यम से वेद,पुराण और उपनिषदों के गूढ़ ज्ञान का उद्घोष होगा,जिससे नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। कार्यक्रम के संयोजक आचार्य रवीदत्त ने कहा कि हमारा प्रमुख ध्येय भारतीय संस्कृति और संस्कारों को जीवंत बनाए रखना है। भागवत कथा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं,बल्कि यह जीवन जीने की कला और मूल्यबोध का सशक्त माध्यम है। इस अवसर पर गांव की बात रेडियो से जुड़ी जानी-मानी आवाज अमृता बहुगुणा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज पाश्चात्य शिक्षा और आधुनिकता के नाम पर हमारी संस्कृति और परंपराओं पर लगातार प्रश्नचिन्ह खड़े किए जा रहे हैं,जो आने वाले समय में गंभीर परिणाम ला सकते हैं। यह एक गहरी चुनौती है,जिससे निपटने के लिए हमें अपने मूल ज्ञान-वेद,पुराण और उपनिषदों की ओर लौटना होगा। सामाजिक चिंतक सीमा कपरूवाण ने कहा कि सनातन को संरक्षित और सशक्त बनाने का एकमात्र मार्ग है-इसे संस्थागत रूप देना। वेद पाठ,कथा-परंपरा और गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से ही हम आने वाली पीढ़ियों तक इस अमूल्य धरोहर को पहुंचा सकते हैं। धाम के संचालक स्वामी अध्दैतानन्द महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि समय के साथ जिस प्रकार बदलाव आ रहे हैं,मनुष्य अपनी संस्कृति और संस्कारों से दूर होता जा रहा है,जो समाज और विश्व के लिए शुभ संकेत नहीं है। यदि हमें अपने अस्तित्व और पहचान को बनाए रखना है,तो वेद,पुराण और उपनिषदों का अध्ययन अनिवार्य है। यही सनातन को जीवंत रखने का एकमात्र मार्ग है। इस अवसर पर स्वामी सच्चिदानंद,विद्यानन्द,प्रफुल,भूप यायावर सहित अनेक संत,विद्वान एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम में सभी वक्ताओं ने एक स्वर में सनातन संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का आह्वान किया। लक्ष्मोली की पावन धरा पर यह आयोजन न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करेगा,बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक ऐतिहासिक प्रयास भी साबित होगा।
