हिमालयी कृषि को नई उड़ान-हैप्रेक की वैज्ञानिक तकनीक से बच की खेती में क्रांति

श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती को नई दिशा देने वाला एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक शोध सामने आया है। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र (हैप्रेक) के वैज्ञानिकों ने औषधीय पौधा बच की खेती के लिए ऐसी आधुनिक तकनीक विकसित की है,जो उत्पादन,गुणवत्ता,लाभ और पर्यावरणीय संतुलन के लिहाज से बेहद प्रभावशाली साबित हुई है। हैप्रेक के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस शोध में हाइड्रोपोनिक्स,एरोपोनिक्स और पारंपरिक भू-आधारित खेती प्रणाली (जियोपोनिक्स) का तुलनात्मक अध्ययन किया गया,जिसमें हाइड्रोपोनिक्स प्रणाली सर्वाधिक लाभकारी और टिकाऊ खेती प्रणाली के रूप में उभरकर सामने आई। इस महत्वपूर्ण शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी मान्यता मिली है और इसके निष्कर्ष विश्व प्रसिद्ध शोध पत्रिका जर्नल ऑफ क्लीनर प्रोडक्शन में प्रकाशित हुए हैं। यह उपलब्धि केवल गढ़वाल विश्वविद्यालय ही नहीं,बल्कि पूरे उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्र के लिए गर्व का विषय मानी जा रही है। पर्यावरण विज्ञान,सतत विकास,स्वच्छ उत्पादन तकनीकों और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों पर आधारित यह जर्नल विश्व की प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में गिना जाता है,जिसे एल्सेवियर प्रकाशन समूह प्रकाशित करता है। वैज्ञानिक जगत में इस जर्नल में शोध प्रकाशित होना गुणवत्ता और उत्कृष्टता का प्रतीक माना जाता है। शोध में यह तथ्य सामने आया कि हाइड्रोपोनिक्स प्रणाली में बच के पौधों की वृद्धि अन्य प्रणालियों की तुलना में कहीं अधिक तेज और बेहतर रही। पौधों में पत्तियों की संख्या,पत्तियों की लंबाई तथा भूमिगत तने यानी राइजोम का उत्पादन सबसे अधिक दर्ज किया गया। साथ ही पौधों से प्राप्त आवश्यक औषधीय तेलों की गुणवत्ता और मात्रा भी श्रेष्ठ पाई गई। आर्थिक दृष्टि से भी यह प्रणाली अत्यंत लाभकारी साबित हुई। शोध के अनुसार हाइड्रोपोनिक्स प्रणाली में प्रति उत्पादन चक्र लगभग 592.47 हजार अमेरिकी डॉलर का सकल लाभ और 490.26 हजार अमेरिकी डॉलर का शुद्ध लाभ दर्ज किया गया,जो एरोपोनिक्स और पारंपरिक खेती दोनों से काफी अधिक है। हैप्रेक संस्थान के निदेशक डॉ.विजयकांत पुरोहित ने बताया कि हाइड्रोपोनिक्स प्रणाली में पोषक तत्वों का उपयोग अत्यंत दक्षता के साथ होता है,जिससे पौधों की वृद्धि और उत्पादन क्षमता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। उन्होंने कहा कि भविष्य में यह तकनीक हिमालयी क्षेत्रों में किसानों की आय बढ़ाने और टिकाऊ कृषि मॉडल विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। वैज्ञानिकों ने बताया कि एरोपोनिक्स प्रणाली ने जल उपयोग दक्षता के मामले में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। इस तकनीक में पानी की खपत काफी कम रही तथा पौधों की जड़ों का विकास बेहतर पाया गया। हालांकि इसमें ऊर्जा की मांग और कार्बन उत्सर्जन अपेक्षाकृत अधिक दर्ज किए गए। दूसरी ओर पारंपरिक जियोपोनिक्स प्रणाली में ऊर्जा की आवश्यकता कम रही,लेकिन उत्पादन क्षमता और पोषक तत्व उपयोग दक्षता सीमित पाई गई। शोध छात्रा डॉ.पल्लवी नौटियाल तथा वैज्ञानिक डॉ.विजयलक्ष्मी त्रिवेदी ने बताया कि जलवायु परिवर्तन,घटती कृषि भूमि और बढ़ती औषधीय पौधों की मांग के बीच मिट्टी रहित खेती प्रणालियां भविष्य की कृषि के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती हैं। इन तकनीकों से जल संरक्षण,नियंत्रित पोषण प्रबंधन और पर्यावरणीय प्रभावों में कमी लाई जा सकती है। उन्होंने बताया कि शोध के दौरान पौधों की वृद्धि,जैवभार,पोषक तत्व अवशोषण तथा आवश्यक तेलों की संरचना का विस्तृत विश्लेषण किया गया।क्षइसमें बीटा-असारोन और अल्फा-असारोन जैसे महत्वपूर्ण औषधीय यौगिकों की मात्रा हाइड्रोपोनिक्स प्रणाली में सबसे अधिक दर्ज की गई। ये यौगिक एंटीऑक्सीडेंट,सूक्ष्मजीवरोधी तथा औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध हैं और आयुर्वेदिक एवं फार्मास्यूटिकल उद्योगों में इनकी भारी मांग रहती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि नियंत्रित वातावरण आधारित खेती प्रणालियां विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में औषधीय पौधों की व्यावसायिक खेती को नई गति दे सकती हैं। सीमित कृषि भूमि,जल संकट और बदलते मौसम के बीच यह तकनीक किसानों के लिए अधिक आय,कम जोखिम और टिकाऊ खेती का प्रभावी विकल्प बनकर उभर सकती है। हैप्रेक के पूर्व निदेशक प्रो.एम.सी.नौटियाल ने कहा कि यह शोध आधुनिक कृषि प्रणालियों को अधिक संसाधन-कुशल,पर्यावरण अनुकूल और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देगा। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण,ऊर्जा दक्षता और सतत विकास जैसे वैश्विक लक्ष्यों की प्राप्ति में इस प्रकार के वैज्ञानिक शोध भविष्य में निर्णायक भूमिका निभाएंगे। जर्नल ऑफ क्लीनर प्रोडक्शन एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सहकर्मी-समीक्षित शोध पत्रिका है,जिसे एल्सेवियर प्रकाशन समूह द्वारा प्रकाशित किया जाता है। यह पत्रिका सतत विकास,पर्यावरण विज्ञान,स्वच्छ उत्पादन तकनीक,चक्रीय अर्थव्यवस्था,पर्यावरणीय मूल्यांकन और कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषयों पर शोध प्रकाशित करती है। क्यू-1 रैंकिंग और उच्च इंपैक्ट फैक्टर के कारण इसे पर्यावरण विज्ञान की अग्रणी पत्रिकाओं में शामिल किया जाता है।
