Sunday 05/ 07/ 2026 

Bharat Najariya
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राज्य

बाघ भी बचें,इंसान भी बचे-उत्तराखंड में हर जिले में आधुनिक चिड़ियाघर और रेस्क्यू सेंटर अब समय की सबसे बड़ी मांग


श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की पहचान उसकी समृद्ध जैव विविधता,घने जंगलों और दुर्लभ वन्यजीवों से है। लेकिन आज यही वन्यजीव,विशेषकर बाघ और गुलदार,आम लोगों के लिए भय और चिंता का कारण बनते जा रहे हैं। राज्य के अनेक जिलों से लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं,जहां मासूम बच्चे,महिलाएं और पुरुष बाघ अथवा गुलदार के हमलों का शिकार हुए हैं। कई परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है,जबकि अनेक लोग आज भी इन हमलों की पीड़ा झेल रहे हैं। गांवों में शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है और लोग भय के साये में जीवन जीने को विवश हैं। वन्यजीव संरक्षण निस्संदेह आवश्यक है। राष्ट्रीय पशु बाघ हमारी प्राकृतिक धरोहर है और उसका संरक्षण देश का दायित्व भी है। लेकिन उतना ही आवश्यक प्रत्येक नागरिक के जीवन की सुरक्षा भी है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में वन्यजीव संरक्षण और मानव जीवन-दोनों को समान संवेदनशीलता और प्राथमिकता के साथ देखा जाना चाहिए। मानव-वन्यजीव संघर्ष के पीछे केवल एक कारण नहीं,बल्कि कई सामाजिक और पर्यावरणीय परिस्थितियां भी जिम्मेदार मानी जाती हैं। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन के कारण हजारों गांव सूने पड़ गए हैं। कभी जिन खेतों में लहलहाती फसलें होती थीं,वे आज बंजर होकर झाड़ियों और घने वनस्पति क्षेत्र में बदलते जा रहे हैं। इससे जंगल और मानव बस्तियों के बीच की प्राकृतिक दूरी कई स्थानों पर कम हुई है और जंगली जानवर आबादी के करीब दिखाई देने लगे हैं। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि गांवों में खेती-बाड़ी को पुनर्जीवित किया जाए,पलायन रोकने के प्रभावी प्रयास हों और बंजर भूमि का उत्पादक उपयोग बढ़े,तो मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में भी सहायता मिल सकती है। हालांकि यह समस्या कई अन्य कारणों से भी जुड़ी है और इसका समाधान व्यापक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही संभव है। ऐसे में अब समय आ गया है कि उत्तराखंड सरकार केवल तात्कालिक राहत उपायों तक सीमित न रहे,बल्कि दीर्घकालिक और वैज्ञानिक समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य के प्रत्येक जिले में उपलब्ध सरकारी बंजर एवं अनुपयोगी भूमि पर आधुनिक चिड़ियाघर,वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर और पुनर्वास केंद्र स्थापित करने की संभावनाओं का गंभीर अध्ययन किया जाना चाहिए। ऐसे केंद्र घायल,भटके अथवा रेस्क्यू किए गए वन्यजीवों के उपचार,पुनर्वास,अनुसंधान और संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसके साथ ही सरकार को संवेदनशील क्षेत्रों में कैमरा ट्रैप,ड्रोन निगरानी,त्वरित रेस्क्यू टीमें,वन्यजीवों की नियमित मॉनिटरिंग,जन-जागरूकता अभियान तथा प्रभावित परिवारों को समयबद्ध सहायता जैसी व्यवस्थाओं को और मजबूत करना चाहिए। साथ ही कृषि,ग्रामीण विकास और वन विभाग के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर गांवों को फिर से आबाद करने तथा खेती को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी ठोस प्रयास किए जाने चाहिए। उत्तराखंड की पहचान उसके जंगलों और वन्यजीवों से है,लेकिन उसकी सबसे बड़ी पहचान यहां के मेहनतकश लोग भी हैं। यदि ग्रामीण भय के कारण खेतों में न जा सकें,बच्चे स्कूल जाने से डरें और महिलाएं घर से बाहर निकलने में असुरक्षित महसूस करें,तो यह केवल वन्यजीव संरक्षण का विषय नहीं,बल्कि सामाजिक,आर्थिक और मानवीय चिंता का भी प्रश्न है। आज आवश्यकता किसी एक पक्ष पर दोषारोपण करने की नहीं,बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी निभाने की है। सरकार,वन विभाग,पर्यावरणविदों,स्थानीय समुदायों और आम नागरिकों को मिलकर ऐसा संतुलित मॉडल विकसित करना होगा,जिसमें खेत फिर से हरे-भरे हों,गांव फिर से आबाद हों,जंगल सुरक्षित रहें,वन्यजीव अपने प्राकृतिक आवास में रहें और उत्तराखंड का प्रत्येक नागरिक भयमुक्त होकर जीवन जी सके। यदि समय रहते दूरदर्शी और वैज्ञानिक पहल की गई,तो उत्तराखंड मानव और वन्यजीवों के संतुलित सह-अस्तित्व का एक आदर्श मॉडल बनकर पूरे देश के सामने नई मिसाल कायम कर सकता है।

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