मैं वापस आऊंगा ने ताजा किए बंटवारे के जख्म, पर्दे पर अपनों का दर्द देख छलक पड़े आंसूरिट्ज सिनेमा में विशेष प्रदर्शन के दौरान बंटवारे के पीड़ित परिवारों ने साझा किए दर्दनाक अनुभव, बोले- कत्लेआम की याद आज भी सिहरन पैदा करती है

पहाड़ों की रानी मसूरी के रिट्ज सिनेमा में गुरुवार को दोपहर तीन बजे फिल्म ष्मैं वापस आऊंगा का विशेष प्रदर्शन किया गया। इस अवसर पर वर्ष 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद मसूरी में आकर बसे अनेक शरणार्थी परिवार मौजूद रहे। जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ी, विभाजन की त्रासदी, बिछड़े परिवारों की पीड़ा और बेघर होने का दर्द पर्दे पर जीवंत होता गया। सिनेमा हॉल में बैठे कई बुजुर्गों की आंखें नम हो गईं और दशकों पुराने जख्म एक बार फिर हरे हो उठे। फिल्म की कहानी और पटकथा मसूरी के वरिष्ठ नागरिक प्रमोद साहनी की भतीजी ने लिखी और निर्देशित की है। फिल्म में विभाजन के दौरान लाखों लोगों के विस्थापन, हिंसा और अपनों से बिछड़ने की पीड़ा को बेहद संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है।
फिल्म देखने के बाद विभाजन के प्रत्यक्षदर्शी इंद्रजीत सिंह भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि बंटवारे के समय उनका परिवार पाकिस्तान से मसूरी आकर बस गया था। उन्होंने कहा कि एक समय उन्होंने अपने पुराने घर को देखने के लिए पाकिस्तान जाने की कोशिश भी की थी, लेकिन जिस तरह का कत्लेआम और अमानवीय हिंसा उन्होंने अपने परिवार और अन्य लोगों के साथ होते देखी थी, उसकी यादों ने उनका मन तोड़ दिया। इसलिए वह कभी अपने पुराने घर नहीं जा सके। उन्होंने कहा, आज फिल्म देखते हुए सब कुछ आंखों के सामने फिर से जीवंत हो गया। खासकर महिलाओं और मासूम बच्चों पर हुए अत्याचारों के दृश्य देखकर अपने पूर्वजों का दर्द फिर महसूस होने लगा। ऐसा लगा मानो इतिहास फिर सामने खड़ा हो गया हो।ष्
वहीं प्रमोद साहनी ने बताया कि विभाजन के बाद उनके पिता एक बार पाकिस्तान अपने पुराने घर और प्रिंटिंग प्रेस को देखने गए थे। वहां उनका मकान दूसरे लोगों के कब्जे में था और उनकी प्रिंटिंग प्रेस पंजाब प्रिंटिंग प्रेस भी उसी नाम से संचालित हो रही थी। उन्होंने बताया कि जब वहां के लोगों को पता चला कि वे भारत से अपने पुराने घर को देखने आए हैं, तो उन्होंने उनका सम्मान किया और आत्मीयता से स्वागत किया। प्रमोद साहनी ने बताया कि 1946 में मसूरी आ गये थे विभाजन के बाद उनका एक कर्मचारी भी उनके साथ भारत आया था। जिसका नाम चिरागदीन था उसने अपनी पहचान बदलकर यहीं नया जीवन शुरू किया और पना नाम चरण दास रख दिया उन्होंने कहा कि फिल्म में विभाजन की पीड़ा को बेहद सशक्त ढंग से दिखाया गया है। उनकी पोती ने भी इस फिल्म के निर्माण में योगदान दिया है, जिस पर उन्हें गर्व है। विशेष प्रदर्शन के दौरान मौजूद लगभग सभी शरणार्थी परिवारों की आंखें नम थीं। किसी को अपना छूटा हुआ घर याद आ रहा था तो किसी को बिछड़े रिश्तेदार। फिल्म के कई दृश्य ऐसे थे, जिन्होंने दशकों पुरानी यादों को फिर से जीवंत कर दिया। हॉल में कई बुजुर्ग भावुक होकर अपने अनुभव एक-दूसरे से साझा करते नजर आए।
कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने कहा कि ष्मैं वापस आऊंगा केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों के दर्द, संघर्ष और विस्थापन की कहानी है, जिन्होंने विभाजन की कीमत अपनी पूरी जिंदगी में चुकाई। उनका मानना था कि नई पीढ़ी को इस त्रासदी से अवगत कराने के लिए ऐसी फिल्मों का निर्माण समय की जरूरत है, ताकि इतिहास के उस दर्दनाक अध्याय को भुलाया न जा सके। इस मौके पर संदीप सहानी, मनमोहन कर्णवाल, षैलेन्द्र कर्णवाल, इंदरजीत सिंह कोहली सहित कई लोग मौजूद थे।
