Wednesday 24/ 06/ 2026 

Bharat Najariya
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राज्य

हाईकोर्ट के आदेश का पालन करना ऊधमपुर नगर पुलिस को पड़ा भारी

उत्तराखंड में अपनी मित्रता छवि और कर्तव्यनिष्ठ कार्यशैली के लिए पहचानी जाने वाली उत्तराखंड पुलिस आज एक दुखद घटना के बाद सवालों के घेरे में आ खड़ी हुई है। मामला ऐसा है, जहां पुलिस पर आरोप लग रहे हैं, लेकिन सच्चाई के कई पहलू ऐसे हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता

आप सभी पुलिसकर्मियों या पुलिस के आला अधिकारियों को दोषी नहीं ठहरा सकते कुछ लोग इस मामले में राजनीति कर रहे हैं जो बिल्कुल भी उत्तराखण्ड या यूं कहें

ऊधमपुर सिंह नगर के हित में नहीं है

दरअसल, हाईकोर्ट ने रिट याचिका संख्या WPCRL 1534/2025 में 25 नवंबर 2025 को एक स्पष्ट आदेश जारी किया था। इस आदेश के तहत प्रथम पक्ष अमरजीत सिंह आदि बनाम राज्य सरकार मामले में संबंधित पक्ष को सुरक्षा (प्रोटेक्शन) प्रदान करने के निर्देश दिए गए थे। साथ ही काशीपुर थाना प्रभारी को इस आदेश के अनुपालन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

जनपद ऊधम सिंह नगर की पुलिस अदालत के निर्देशों के अनुरूप कार्य कर रही थी। पुलिस के सामने सबसे बड़ी बाध्यता यही थी कि वह कानून और न्यायालय के आदेश से बंधी हुई है। इसी दौरान दो पक्षों के बीच लेन-देन से जुड़ा विवाद इतना गंभीर हो गया कि मामला एक दुखद मौत तक पहुंच गया।

मृतक सुखवंत सिंह द्वारा आशीष चौहान और उसके साथियों पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि इन्हीं आरोपितों को हाईकोर्ट द्वारा पहले से ही प्रोटेक्शन दिया गया था। ऐसे में पुलिस के लिए स्थिति बेहद संवेदनशील और जटिल हो गई थी। न्यायालय के आदेश के रहते पुलिस किसी भी प्रकार की मनमानी कार्रवाई नहीं कर सकती थी।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या पुलिस को हाईकोर्ट के आदेश की अनदेखी करनी चाहिए थी? क्या अदालत के निर्देशों के बावजूद कार्रवाई कर देना सही होता? यदि पुलिस ऐसा करती तो क्या वह सीधे तौर पर अवमानना के दायरे में नहीं आ जाती?

आज पुलिस अधिकारियों, विशेषकर वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी मणिकांत मिश्रा पर सवाल उठाए जा रहे हैं। वही अधिकारी, जिन्होंने जनपद को अपराध मुक्त बनाने के लिए दिन-रात मेहनत की, अपराधियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया और आम जनता की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। जिनके कार्यों की सराहना कभी मीडिया और सोशल मीडिया पर होती रही, आज वही कुछ लोगों की आंखों की किरकिरी बनते नजर आ रहे हैं।

यह भी विचारणीय है कि क्या बिना किसी ठोस जांच और प्रमाण के किसी ईमानदार अधिकारी को कटघरे में खड़ा कर देना न्यायसंगत है? या फिर किसी पक्ष विशेष को संतुष्ट करने के लिए एक कर्तव्यनिष्ठ अफसर को दोषी ठहराने की कोशिश की जा रही है?निस्संदेह किसी व्यक्ति की मृत्यु बेहद दुखद और पीड़ादायक घटना है। उस परिवार के प्रति पूरी संवेदना है। लेकिन यह भी सच है कि देश संविधान और कानून से चलता है। जब मामला न्यायालय में होता है, तब किसी व्यक्ति या पद की नहीं, बल्कि कानून और अदालत के आदेश की सर्वोच्चता होती है।अब आवश्यकता है कि भावनाओं से ऊपर उठकर तथ्यों की निष्पक्ष जांच हो और सच्चाई सामने आए। ताकि न तो किसी निर्दोष को दोषी ठहराया जाए और न ही कानून के पालन को अपराध बना दिया जाए

एक तरफ खुद मृतक किसान स्व सुखबंत सिंह के भाई ने

पुलिस अधीक्षक मणिकांत मिश्रा की तारीफ कर रहे हैं

तो वही कुछ नेता अपनी नेतागिरी चमकाने में लगे हैं

सरदार सुखबंत सिंह का आत्महत्या ने सभी को झकझोर कर रख दिया है लेकिन सरकार के द्वारा मजिस्ट्री जांच आदेश दिए गए हैं जांच में जो भी दोषी होगा उसको सजा जरूर मिलेगी

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