Friday 04/ 09/ 2026 

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अंधकार चीरकर दिव्य चेतना के प्राकट्य का पर्व है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी–डॉ.अखिलेश चन्द्र चमोला


श्रीनगर गढ़वाल। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी की वह मध्यरात्रि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में केवल एक तिथि नहीं,बल्कि अंधकार के बीच दिव्य चेतना के प्राकट्य का प्रतीक मानी जाती है। इसी पावन अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ,जिन्होंने मानव जीवन को धर्म,कर्म,प्रेम,नीति,भक्ति और लोककल्याण का ऐसा दर्शन दिया,जिसकी प्रासंगिकता युगों बाद भी बनी हुई है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को लेकर डॉ.अखिलेश चन्द्र चमोला कहते हैं कि यह पर्व बाहरी आडंबर अथवा केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक संदेश मनुष्य के भीतर छिपी दिव्य चेतना को जागृत करना है। जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य अंधकारमय कारागार में हुआ,उसी प्रकार मनुष्य के अंतर्मन में जब ज्ञान और भक्ति का प्रकाश उत्पन्न होता है तो अज्ञान,अहंकार और नकारात्मकता के बंधन टूटने लगते हैं। वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार इस वर्ष शुक्रवार 4 सितंबर 2026 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। बताया गया है कि अष्टमी तिथि का प्रारंभ 4 सितंबर को प्रातः 2.25 बजे से होगा और इसका समापन 5 सितंबर को मध्यरात्रि 12.13 बजे होगा। रोहिणी नक्षत्र का आरंभ 4 सितंबर को मध्यरात्रि 12.29 बजे से होकर रात्रि 11.4 बजे तक रहने की जानकारी दी गई है। भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का मुख्य निशीथकालीन पूजन 4 सितंबर की रात्रि 11.57 बजे से 5 सितंबर को मध्यरात्रि 12.43 बजे के मध्य किया जाएगा। गृहस्थ एवं स्मार्त परंपरा में 4 सितंबर को जन्मोत्सव मनाया जाएगा,जबकि वैष्णव परंपरा में कई स्थानों पर 5 सितंबर को नंदोत्सव एवं पारण का आयोजन होगा। डॉ.चमोला के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण भाद्रपद मास,कृष्ण पक्ष,अष्टमी तिथि,रोहिणी नक्षत्र,वृषभ राशि में चंद्रमा और मध्यरात्रि के अद्भुत संयोग में हुआ था। इस वर्ष भी जन्माष्टमी के अवसर पर विभिन्न शुभ योगों का उल्लेख किया गया है। जयंती योग को अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के निशीथकालीन संयोग से जुड़ा माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में जप,ध्यान,साधना और दान का विशेष महत्व होता है। इसी प्रकार हर्षण योग और सर्वार्थ सिद्धि योग को भी शुभ माना गया है। हर्षण योग मन में आनंद और सकारात्मकता का भाव उत्पन्न करने वाला तथा सर्वार्थ सिद्धि योग शुभ कार्यों के लिए अनुकूल माना जाता है। वृषभ राशि में चंद्रमा की स्थिति को भी आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह मन की स्थिरता और शांति के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करती है। डॉ.अखिलेश चन्द्र चमोला श्रीकृष्ण जन्मकथा के आध्यात्मिक पक्ष को समझाते हुए कहते हैं कि कंस का कारागार केवल एक ऐतिहासिक स्थान नहीं,बल्कि मनुष्य के भीतर मौजूद काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार की बेड़ियों का प्रतीक भी है। उफनती यमुना को संसार रूपी भवसागर और वासुदेव द्वारा टोकरी में भगवान श्रीकृष्ण को लेकर आगे बढ़ने को शरणागति एवं विश्वास का प्रतीक माना जा सकता है। जब मनुष्य के भीतर भक्ति और ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है तो अज्ञान के बंधन कमजोर पड़ने लगते हैं और जीवन में सकारात्मक चेतना का संचार होता है। भगवान श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व भारतीय दर्शन में जीवन की संपूर्णता का प्रतिनिधित्व करता है। वे यशोदा के आंगन में बाल रूप में वात्सल्य और प्रेम की अनुभूति कराते हैं,गोपियों के साथ रासलीला में आत्मा और परमात्मा के आध्यात्मिक मिलन का संदेश देते हैं और कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सारथी बनकर मानव जीवन के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का शाश्वत ज्ञान प्रदान करते हैं। उनका संदेश केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं है। कर्म के प्रति निष्ठा,परिणाम की चिंता से ऊपर उठकर अपने कर्तव्य का निर्वहन,धर्म की स्थापना और लोककल्याण के लिए समर्पण-श्रीकृष्ण दर्शन के ये सभी पक्ष आज भी मानव जीवन के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं। इसी भाव को भक्तजन इस स्तुति के माध्यम से व्यक्त करते हैं-वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।। डॉ.चमोला के अनुसार जन्माष्टमी का वास्तविक उत्सव केवल उपवास,पूजा,सजावट और झांकियों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसका मूल संदेश है कि मनुष्य अपने भीतर की नकारात्मक शक्तियों पर विजय प्राप्त करे और अपने जीवन में ज्ञान,करुणा,सत्य,धर्म एवं निष्काम कर्म को स्थान दे। वे कहते हैं कि आज के दौर में जब समाज विभिन्न प्रकार की चुनौतियों और तनावों से गुजर रहा है,तब श्रीकृष्ण का जीवन-दर्शन मनुष्य को संतुलन और कर्तव्य का मार्ग दिखाता है। अन्याय के सामने मौन न रहना,धर्म और सत्य के पक्ष में खड़े होना तथा समाज के हित में अपने कर्म को समर्पित करना ही श्रीकृष्ण संदेश की सार्थक अभिव्यक्ति है। जब भीतर जागे कृष्ण,तभी सार्थक होगा जन्माष्टमी पर्व श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का आध्यात्मिक अर्थ अंततः मनुष्य के अपने भीतर झांकने से जुड़ता है। जिस रात भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य अंधकार में हुआ,वही संदेश आज भी मानव समाज को यह प्रेरणा देता है कि सबसे घना अंधकार भी प्रकाश के उदय को रोक नहीं सकता। यदि मनुष्य अपने भीतर के कंस अर्थात अहंकार,क्रोध,लोभ और अन्याय पर विजय पाने का संकल्प ले,अपने कर्म को लोककल्याण के लिए समर्पित करे और सत्य एवं धर्म के मार्ग पर चले,तो यही उसके जीवन में श्रीकृष्ण चेतना का वास्तविक प्राकट्य होगा। इस दृष्टि से जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं,बल्कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर सोई हुई दिव्य चेतना को जगाने का आह्वान है।

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