एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय में संस्कृत सप्ताह महोत्सव में सजी कालिदास की अमर गाथा-कालिदासस्य विवाह के मंचन ने बांधा समां

श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के बिड़ला परिसर स्थित संस्कृत विभाग में आयोजित संस्कृत सप्ताह महोत्सव के द्वितीय दिवस का आयोजन भारतीय ज्ञान परंपरा,संस्कृत साहित्य और सांस्कृतिक चेतना की अद्भुत छटा के साथ भव्य एवं गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में जहां विद्वानों ने संस्कृत भाषा की वैश्विक प्रासंगिकता और भारतीय ज्ञान परंपरा में उसके मूल महत्व पर प्रकाश डाला,वहीं विद्यार्थियों की सशक्त सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने समारोह में जीवंतता भर दी। कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण महाकवि कालिदास के जीवन प्रसंग पर आधारित संस्कृत लघु नाटक कालिदासस्य विवाह रहा। विद्यार्थियों द्वारा किए गए प्रभावशाली मंचन ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। कलाकारों के संवाद,अभिनय और मंचीय प्रस्तुति को उपस्थित दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से सराहा। समारोह के शुभारंभ पर अतिथियों का पारंपरिक रूप से स्वागत किया गया। संस्कृत विभाग,बिड़ला परिसर के विभागाध्यक्ष डॉ.विश्वेश वाग्मी ने स्वागत वक्तव्य में अतिथियों,शिक्षकों,शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों का अभिनंदन करते हुए संस्कृत को भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल आधार बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान,दर्शन,संस्कृति और चिंतन की विशाल परंपरा को समझने के लिए संस्कृत विद्या का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। भारत के स्व का साक्षात्कार संस्कृत के ज्ञान के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे संस्कृत को केवल एक भाषा के रूप में न देखें,बल्कि भारतीय सभ्यता और ज्ञान परंपरा के जीवंत स्रोत के रूप में उससे जुड़ें। समारोह की मुख्य वक्ता दर्शनशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्षा डॉ.कविता भट्ट ने भारतीय दर्शन और संस्कृत साहित्य के गहरे अंतर्संबंधों पर सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की विरासत नहीं,बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शक शक्ति है। उन्होंने छात्र-छात्राओं को भारतीय ज्ञान परंपरा,दर्शन और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ने के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान एवं परंपराओं को आज दुनिया भर में सम्मान की दृष्टि से देखा और स्वीकार किया जा रहा है। ऐसे में युवा पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह अपनी समृद्ध बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विरासत को जाने,समझे और आगे बढ़ाए। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्कृत विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो.कमला चौहान ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने संस्कृत भाषा के वैश्विक महत्व,भारतीय सांस्कृतिक विरासत में उसके योगदान तथा आधुनिक समय में उसकी प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल प्राचीन ग्रंथों की भाषा नहीं है,बल्कि इसमें निहित ज्ञान,चिंतन,साहित्य और दर्शन आज भी मानव समाज को दिशा देने की क्षमता रखते हैं। संस्कृत के अध्ययन और संरक्षण के साथ नई पीढ़ी को जोड़ना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। समारोह का सबसे आकर्षक और जीवंत पक्ष संस्कृत विभाग के छात्र-छात्राओं द्वारा प्रस्तुत लघु नाटक कालिदासस्य विवाह रहा। महाकवि कालिदास के जीवन से जुड़े प्रसंगों को मंच पर संस्कृत भाषा में प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। विद्यार्थियों ने अपने अभिनय,संवाद अदायगी,भावाभिव्यक्ति और मंचीय अनुशासन से दर्शकों का मन मोह लिया। नाटक के दौरान सभागार तालियों से गूंजता रहा। प्रस्तुति ने यह भी साबित किया कि संस्कृत भाषा को यदि रचनात्मक और मंचीय माध्यम से विद्यार्थियों से जोड़ा जाए तो वह आज भी उतनी ही प्रभावी और आकर्षक बन सकती है। इसके साथ ही छात्र-छात्राओं ने संस्कृत के विभिन्न सुभाषितों का सस्वर पाठ किया। सुभाषितों की ओजपूर्ण एवं मधुर प्रस्तुति ने संस्कृत भाषा के लालित्य,माधुर्य और सौंदर्य को प्रभावी ढंग से सामने रखा। विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित हिन्दी विभाग के आचार्य डॉ.कपिल पंवार तथा लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केन्द्र के आचार्य डॉ.महेंद्र पंवार ने विद्यार्थियों की नाट्य प्रतिभा की सराहना की। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों में रचनात्मक प्रतिभा को मंच उपलब्ध कराने से उनके व्यक्तित्व का बहुआयामी विकास होता है। दोनों अतिथियों ने भविष्य में हिन्दी,संस्कृत तथा लोक कला एवं संस्कृति से जुड़े विभागों के संयुक्त तत्वावधान में नाट्य प्रस्तुतियों के आयोजन की संभावनाओं पर भी विचार साझा किए। इससे भारतीय भाषाओं और लोक संस्कृति को एक साझा मंच प्रदान करने की दिशा में नए अवसर पैदा हो सकते हैं। कार्यक्रम का समापन डॉ.प्रीति के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी अतिथियों,शिक्षकों,शोधार्थियों,विद्यार्थियों एवं आयोजन से जुड़े सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया। इसके उपरांत सभी ने सामूहिक रूप से ध्येयमंत्र एवं शांतिपाठ का गायन किया। पूरे कार्यक्रम का कुशल एवं प्रभावी मंच संचालन डॉ.बालकृष्ण बधानी ने किया। विश्वविद्यालय परिसर में भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृत भाषा के प्रति नई ऊर्जा एवं उत्साह का संचार करने वाला रहा। आयोजन ने यह संदेश भी दिया कि संस्कृत को केवल पुस्तकों और शास्त्रीय ग्रंथों तक सीमित रखने के बजाय नाटक,साहित्य,कला और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से नई पीढ़ी से जोड़कर उसे वर्तमान समय में और अधिक जीवंत बनाया जा सकता है। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षक,शोधार्थी तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

