Saturday 27/ 06/ 2026 

Bharat Najariya
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मसूरी के पास सैंजी गांव में तिब्बत विजय का उत्सव को लेकर मंगसीर की बग्वाल त्यौहार धूमधाम के साथ मनाया


कार्तिक दीपावली से एक माह बाद मनाया जाने वाला मंगसीर बग्वाल मसूरी के पास सैंजी गांव जिसको कॉर्न विपेज के नाम से भी जाना जाता है में तिब्बत विजय के प्रतीक के रूप में मनाया गयज्ञं मसूरी के पास बग्वाल यानी दीप के इस उत्सव का गढ़वाल के लिए अलग ही महत्व है। इतिहास के जानकार बताते हैं कि मंगसीर की बग्वाल गढ़वाली सेना की तिब्बत विजय का उत्सव है। घर में दिवाली के उत्सव को लेकर पकवान उड़द की दाल के पकोड़े और आलू, गहथ की भरी पूरियां बनाई गई। मंगसीर की दिवाली का ग्रामीणों को महीनों पहले से इंतजार होता था। इस दौरान ग्रामीणों का खेतों का काम निपट जाता है। ऐसे में त्योहार को हर्षोल्लास से मनाया जाता था। दिवाली पर ग्रामीण गांव की थाती पर एकत्र होकर एक साथ भैले (छिलकों से बनाया हुआ) जलाकर देर रात तक ढोल-दमाऊ की थाप पर नृत्य कर एक-दूसरे के घर में पकवानों से भरी थालियां भेंट की। कार्यक्रम में हर साल देष विदेष के पर्यटक बड़ी तादाद में शिरकत की।
स्थानीय ग्रामीण कुवर सिंह सजवाण ओर कमल सिंह रावत बताते है कि वर्ष 1627-28 के बीच गढ़वाल नरेश महिपत शाह के शासनकाल के दौरान तिब्बती लुटेरे गढ़वाल की सीमाओं के अंदर घुसकर लूटपाट करते थे।इस पर राजा ने माधो सिंह भंडारी व लोदी रिखोला के नेतृत्व में चमोली के पैनखंडा और उत्तरकाशी के टकनौर क्षेत्र से सेना भेजी थी। गढ़वाली सेना विजय पताका फहराते हुए दावा घाट (तिब्बत) तक पहुंच गई थी।तिब्बत लुटेरों से लड़ाई के कारण कार्तिक मास की दीपावली में माधो सिंह भंडारी घर नहीं पहुंच पाए, इसलिए उन्होंने घर में संदेश पहुंचाया था कि जब वह जीतकर लौटेंगे, तब दीपावली मनाई जाएगी।युद्ध के मध्य में ही एक माह पश्चात माधो सिंह अपने गांव मलेथा पहुंचे। तब उत्सव पूर्वक दीपावली मनाई गई। तब से अब तक मंगसीर माह में इस बग्वाल को मनाने की परंपरा गढ़वाल में प्रचलित है। इस परंपरा का खास मसूरी के पास टिहरी जनपद के सैंजी गांव में दिखता है।

पास सैंजी गांव में तिब्बत विजय का उत्सव को लेकर मंगसीर की बग्वाल त्यौहार धूमधाम के साथ मनाया

कार्तिक दीपावली से एक माह बाद मनाया जाने वाला मंगसीर बग्वाल मसूरी के पास सैंजी गांव जिसको कॉर्न विपेज के नाम से भी जाना जाता है में तिब्बत विजय के प्रतीक के रूप में मनाया गयज्ञं मसूरी के पास बग्वाल यानी दीप के इस उत्सव का गढ़वाल के लिए अलग ही महत्व है। इतिहास के जानकार बताते हैं कि मंगसीर की बग्वाल गढ़वाली सेना की तिब्बत विजय का उत्सव है। घर में दिवाली के उत्सव को लेकर पकवान उड़द की दाल के पकोड़े और आलू, गहथ की भरी पूरियां बनाई गई। मंगसीर की दिवाली का ग्रामीणों को महीनों पहले से इंतजार होता था। इस दौरान ग्रामीणों का खेतों का काम निपट जाता है। ऐसे में त्योहार को हर्षोल्लास से मनाया जाता था। दिवाली पर ग्रामीण गांव की थाती पर एकत्र होकर एक साथ भैले (छिलकों से बनाया हुआ) जलाकर देर रात तक ढोल-दमाऊ की थाप पर नृत्य कर एक-दूसरे के घर में पकवानों से भरी थालियां भेंट की। कार्यक्रम में हर साल देष विदेष के पर्यटक बड़ी तादाद में शिरकत की।
स्थानीय ग्रामीण कुवर सिंह सजवाण ओर कमल सिंह रावत बताते है कि वर्ष 1627-28 के बीच गढ़वाल नरेश महिपत शाह के शासनकाल के दौरान तिब्बती लुटेरे गढ़वाल की सीमाओं के अंदर घुसकर लूटपाट करते थे।इस पर राजा ने माधो सिंह भंडारी व लोदी रिखोला के नेतृत्व में चमोली के पैनखंडा और उत्तरकाशी के टकनौर क्षेत्र से सेना भेजी थी। गढ़वाली सेना विजय पताका फहराते हुए दावा घाट (तिब्बत) तक पहुंच गई थी।तिब्बत लुटेरों से लड़ाई के कारण कार्तिक मास की दीपावली में माधो सिंह भंडारी घर नहीं पहुंच पाए, इसलिए उन्होंने घर में संदेश पहुंचाया था कि जब वह जीतकर लौटेंगे, तब दीपावली मनाई जाएगी।युद्ध के मध्य में ही एक माह पश्चात माधो सिंह अपने गांव मलेथा पहुंचे। तब उत्सव पूर्वक दीपावली मनाई गई। तब से अब तक मंगसीर माह में इस बग्वाल को मनाने की परंपरा गढ़वाल में प्रचलित है। इस परंपरा का खास मसूरी के पास टिहरी जनपद के सैंजी गांव में दिखता है।