“गरीबी वह ‘तेज़ाब’ है, जिसमें खून के रिश्ते भी जल जाते हैं और पैसा वह ‘चुंबक’ है, जो दुश्मनों को भी दोस्त बना लेता है”

इस दुनिया की सबसे कड़वी सच्चाई यह नहीं है कि लोग बुरे होते हैं, बल्कि यह है कि हालात लोगों को बदल देते हैं। गरीबी कोई साधारण अवस्था नहीं, यह धीरे-धीरे इंसान की आत्मा पर गिरता हुआ वह तेज़ाब है जो चेहरे की मुस्कान, आवाज़ की गर्माहट और रिश्तों की मिठास को चुपचाप जला देता है। जब जेब खाली होती है, तब सबसे पहले इंसान की अहमियत खाली होती है। जिन रिश्तों पर हमें सबसे ज़्यादा भरोसा होता है, वही सबसे पहले दूरी बना लेते हैं। भाई-भाई से, दोस्त-दोस्त से और कभी-कभी तो माँ-बाप भी बेबस नज़रों से देखने लगते हैं। गरीबी में इंसान सिर्फ पैसों से नहीं जूझता, वह तानों, उपेक्षा और चुप्पी से भी लड़ता है। उस समय रिश्ते बोझ लगने लगते हैं और इंसान खुद को दुनिया में अनचाहा महसूस करने लगता है।
गरीबी की सबसे बड़ी मार यह है कि वह इंसान से सवाल नहीं पूछती, बल्कि उसे कटघरे में खड़ा कर देती है। लोग मदद नहीं, पहले वजह पूछते हैं — “काम क्यों नहीं करते?”, “कुछ करते क्यों नहीं?”, “हमेशा तुम्हारे साथ ही क्यों ऐसा होता है?” किसी को यह समझने की फुर्सत नहीं होती कि टूटे हुए इंसान को सलाह नहीं, सहारे की ज़रूरत होती है। गरीबी में इंसान की मेहनत भी दिखाई नहीं देती, उसके सपने भी मज़ाक बन जाते हैं। उसकी ईमानदारी कमजोरी कहलाती है और उसका आत्मसम्मान घमंड समझ लिया जाता है। धीरे-धीरे वह इंसान खुद पर शक करने लगता है कि शायद वह सच में किसी काम का नहीं है।
और फिर उसी दुनिया में पैसा प्रवेश करता है — वही पैसा जो रिश्तों का पैमाना बन जाता है। पैसा आते ही लोगों की आवाज़ बदल जाती है, व्यवहार में मिठास घुल जाती है और वही लोग जो कभी नजरें चुराते थे, अचानक हाल-चाल पूछने लगते हैं। पैसा वह चुंबक है जो दुश्मनों को भी दोस्त बना देता है, क्योंकि इंसान का स्वार्थ उससे खिंचा चला आता है। जिन लोगों ने कभी आपकी असफलता पर हँसी उड़ाई थी, वही आपकी सफलता पर सबसे पहले बधाई देने पहुँच जाते हैं। तब एहसास होता है कि दुनिया इंसान को नहीं, उसकी हैसियत को सलाम करती है।
सबसे दर्दनाक सच यह है कि पैसा आने पर रिश्ते वापस तो आते हैं, लेकिन उनकी पवित्रता लौटकर नहीं आती। वो अपनापन, वो सच्चाई, वो बिना मतलब का साथ — सब कहीं पीछे छूट जाता है। तब इंसान सोचता है कि अगर रिश्ते सिर्फ हालात देखकर बदल जाते हैं, तो क्या वे सच में रिश्ते थे या सिर्फ ज़रूरत का समझौता? गरीबी में जो साथ दे, वही अपना होता है — बाकी सब हालात के मेहमान होते हैं, जो मौसम बदलते ही चले जाते हैं।
यह लेख किसी को दोष देने के लिए नहीं, बल्कि सोचने के लिए है। सोचने के लिए कि कहीं हम भी तो उन्हीं लोगों में शामिल नहीं हैं जो पैसे के साथ झुक जाते हैं और गरीबी देखकर मुँह मोड़ लेते हैं। कहीं हम भी तो अपने रिश्तों को इंसान की मजबूरी से नहीं, उसकी उपयोगिता से तो नहीं तौल रहे। अगर आज हमारे पास सब कुछ है, तो कल हालात बदल भी सकते हैं। इसलिए किसी की गरीबी का मज़ाक न बनाइए, क्योंकि वही गरीबी किसी दिन आपकी संवेदनशीलता की परीक्षा बन सकती है।
अंत में बस इतना ही — पैसा ज़रूरी है, बहुत ज़रूरी है, लेकिन अगर पैसा रिश्तों से बड़ा हो जाए, तो समझ लीजिए इंसान छोटा हो गया है। और अगर गरीबी में भी कोई आपके साथ खड़ा है, तो उसे थाम कर रखिए, क्योंकि ऐसे लोग इस तेज़ाब भरी दुनिया में अब बहुत कम बचे हैं।
शुभोधुती कुमार मंडल,
लेखक, पत्रकार
