पांच सौ वर्ष पुरानी आस्था का केंद्र मां डौन्डियों भगवती मंदिर,जहां आज भी जीवित हैं लोक परंपराएं

रुद्रप्रयाग/श्रीनगर गढ़वाल। गढ़वाल की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए मां डौन्डियों भगवती का प्राचीन मंदिर आज भी भक्तों की आस्था और लोक परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। बच्छणस्यूं और कण्डारस्यूं पट्टी की सीमा पर ऊंची पहाड़ी पर बांज,बुरांस,काफल,मोरु और देवदार के घने वृक्षों के बीच स्थित यह मंदिर लगभग पांच सौ वर्ष पुराना माना जाता है। निर्माण की कथा और देवी का स्वप्नादेश-ग्राम आंकसेरा निवासी शिक्षक जसपाल सिंह गुसाई के अनुसार मंदिर का निर्माण गढ़वाल के राजा फतेशाह के समय में खाती गुसाईं गामा जखवाल पहलवान के नेतृत्व में खाती गुसाई वंशजों द्वारा कराया गया था। मान्यता है कि देवी स्वयं गुसाई परिवार के मुखिया के स्वप्न में प्रकट हुईं और आदेश दिया कि वे नयार नदी के तट पर पड़ी उनकी शिला को ऊंची डांग में स्थापित करें। गामा जखवाल पहलवान और गांववालों ने मिलकर नदी किनारे से उस शिला को उठाया। शरणा गांव के पुजारी ने शिला को अपनी पीठ पर रखकर यात्रा आरंभ की। इस दौरान देवी की शिला ने आंकसेरा और पाटा गांव में रात्रि विश्राम भी किया और अंततः डौन्डियोंखाल में मंदिर निर्माण के बाद स्थापित हुई। इसी कारण आज भी आंक गुसाई परिवार को देवी का मैती माना जाता है। विशेष पूजा परंपराएं और देवी का स्वरूप-पूर्व में इस मंदिर में देवी की आराधना के लिए पशुबलि की परंपरा थी। मान्यता है कि जब भी आंक गुसाई परिवार पशुबलि करते,तब देवी को गर्भगृह से बाहर निकालकर विशेष स्थान पर रखा जाता। देवी केवल तीन माह तक बाहर रहतीं और फिर पुनः गर्भगृह में प्रतिष्ठित होतीं। मां डौन्डियों भगवती को महाकाली का स्वरूप माना जाता है। इनके साथ घण्डियाल,हीत,भैरव,नौ नरसिंह और चौसठ बयाल भी माने जाते हैं। बलि प्रथा का अंत और आधुनिक दौर-साल 2005 में तत्कालीन ग्राम प्रधान स्व.सुदामा सिंह गुसाई के प्रयासों और शासन के आदेश के बाद यहां पशुबलि की परंपरा पूर्ण रूप से समाप्त कर दी गई। इसके बाद से मंदिर की देखरेख महाकाली मंदिर समिति द्वारा की जा रही है। जनसहयोग से समिति ने मंदिर का पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार कार्य भी सम्पन्न किया है। नवरात्र पर्व और सांस्कृतिक धरोहर-नवरात्र पर्व पर यहां विशेष पूजा-अर्चना,हवन और अखंड ज्योति प्रज्वलन का आयोजन होता है। अष्टमी के दिन देवी का शुद्धिकरण कर उन्हें पुनः गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया जाता है। इस अवसर पर दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर परिसर और आसपास के गांवों में इन दिनों ढोल-दमाऊं की थाप,लोकगीतों की गूंज और झोड़ा-चांचरी नृत्य की छटा देखने को मिलती है। नवरात्र पर लगने वाले धार्मिक मेले में स्थानीय उत्पादों,पारंपरिक खानपान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की झलक भी देखने को मिलती है। स्थानीय जनभागीदारी और पर्यटन की संभावनाएं-इस मंदिर के संरक्षण और विकास में ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिलती है। ग्रामीण न केवल आर्थिक सहयोग देते हैं,बल्कि श्रमदान की परंपरा से मंदिर परिसर की स्वच्छता और प्रबंधन में भी योगदान करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार और पर्यटन विभाग इस क्षेत्र की धार्मिक पर्यटन योजनाओं में इसे शामिल करे तो यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों का आगमन संभव है। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे और पारंपरिक संस्कृति को भी नया संबल मिलेगा। आस्था और पहचान का केंद्र-मां डौन्डियों भगवती मंदिर न केवल उपासना का स्थान है,बल्कि यह गढ़वाल की उस जीवंत सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है,जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोक परंपराओं और आस्था को संरक्षित करती आई है। पर्यटन सर्किट की दिशा में पहल-शिक्षक जसपाल सिंह गुसाई के अनुसार स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों की साझा राय है कि यदि रुद्रप्रयाग,खिर्सू और पौड़ी को एक पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित किया जाए,तो डौन्डियों भगवती मंदिर जैसे आस्था केंद्र इस सर्किट के आकर्षण को और भी बढ़ा देंगे। इससे धार्मिक पर्यटन को नया आयाम मिलेगा और क्षेत्रीय विकास की राह खुलेगी।