Saturday 02/ 05/ 2026 

Bharat Najariya
बड़ी परियोजनाओं की स्वीकृति पर महापौर ने मुख्यमंत्री का जताया आभारगढ़वाल में स्वास्थ्य शोध का नया युग-मेडिकल कॉलेज बेस अस्पताल में खुलेगा क्लीनिकल व हेल्थ केयर रिसर्च सेंटरपैठाणी में चोरी की वारदातों का पर्दाफाश-नशे की लत ने बनाया किशोरों को अपराधी,पुलिस की मुस्तैदी से खुला पूरा राजशादी बनी हरियाली का उत्सव-समलौण पहल से पहाड़ों में जागी पर्यावरण चेतनागढ़वाली अस्मिता का उत्सव-इन्कलाब आणु चा के विमोचन से श्रीनगर में सजेगा शब्दों का लोक-उत्सवखेलों से जुड़ाव ही स्वस्थ शरीर और सकारात्मक सोच की पहचान-उम्मेद सिंह मेहराश्रीनगर की हवा बहुत खराब श्रेणी में-जंगलों की आग और काले कार्बन ने बढ़ाया खतरा,वैज्ञानिकों ने जारी किया चेतावनी बुलेटिन7वीं उत्तराखंड राज्य फेंसिंग चैम्पियनशिप, 2026 का आयोजन डीपीएस रुद्रपुर मेंरुद्रपुर, उत्तराखंड | अप्रैल 2026फेंसिंग एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड द्वारा 7वीं उत्तराखंड राज्य फेंसिंग चैम्पियनशिप, 2026 का आयोजन दिनांक 03 मई 2026 (रविवार) को दिल्ली पब्लिक स्कूल, रुद्रपुर में किया जा रहा है। प्रतियोगिता का शुभारंभ प्रातः 08:00 बजे से होगा।इस राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में उत्तराखंड के विभिन्न जिलों से खिलाड़ी भाग लेंगे। प्रतियोगिता मिनी, सब-जूनियर, कैडेट, जूनियर एवं सीनियर (बालक एवं बालिका) वर्गों में आयोजित की जाएगी। फेंसिंग एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के अध्यक्ष श्री सुरजीत सिंह जी ने यह जानकारी दी।उल्लेखनीय है कि यह प्रतियोगिता आगामी राष्ट्रीय फेंसिंग चैम्पियनशिप के लिए चयन ट्रायल के रूप में भी आयोजित की जा रही है, जिससे खिलाड़ियों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर प्राप्त होगा।श्री सुरजीत सिंह जी ने सभी संबद्ध जिला फेंसिंग संघों से अनुरोध किया गया है कि वे अपने पात्र खिलाड़ियों की प्रविष्टियां समय पर सुनिश्चित करें तथा प्रतियोगिता के सफल आयोजन हेतु आवश्यक समन्वय करें।फेंसिंग एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड सभी खिलाड़ियों, अधिकारियों एवं खेल प्रेमियों का इस आयोजन में हार्दिक स्वागत करता है और खेल भावना को बढ़ावा देने की अपील करता है।
उत्तराखण्ड

पांच सौ वर्ष पुरानी आस्था का केंद्र मां डौन्डियों भगवती मंदिर,जहां आज भी जीवित हैं लोक परंपराएं

रुद्रप्रयाग/श्रीनगर गढ़वाल। गढ़वाल की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए मां डौन्डियों भगवती का प्राचीन मंदिर आज भी भक्तों की आस्था और लोक परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। बच्छणस्यूं और कण्डारस्यूं पट्टी की सीमा पर ऊंची पहाड़ी पर बांज,बुरांस,काफल,मोरु और देवदार के घने वृक्षों के बीच स्थित यह मंदिर लगभग पांच सौ वर्ष पुराना माना जाता है। निर्माण की कथा और देवी का स्वप्नादेश-ग्राम आंकसेरा निवासी शिक्षक जसपाल सिंह गुसाई के अनुसार मंदिर का निर्माण गढ़वाल के राजा फतेशाह के समय में खाती गुसाईं गामा जखवाल पहलवान के नेतृत्व में खाती गुसाई वंशजों द्वारा कराया गया था। मान्यता है कि देवी स्वयं गुसाई परिवार के मुखिया के स्वप्न में प्रकट हुईं और आदेश दिया कि वे नयार नदी के तट पर पड़ी उनकी शिला को ऊंची डांग में स्थापित करें। गामा जखवाल पहलवान और गांववालों ने मिलकर नदी किनारे से उस शिला को उठाया। शरणा गांव के पुजारी ने शिला को अपनी पीठ पर रखकर यात्रा आरंभ की। इस दौरान देवी की शिला ने आंकसेरा और पाटा गांव में रात्रि विश्राम भी किया और अंततः डौन्डियोंखाल में मंदिर निर्माण के बाद स्थापित हुई। इसी कारण आज भी आंक गुसाई परिवार को देवी का मैती माना जाता है। विशेष पूजा परंपराएं और देवी का स्वरूप-पूर्व में इस मंदिर में देवी की आराधना के लिए पशुबलि की परंपरा थी। मान्यता है कि जब भी आंक गुसाई परिवार पशुबलि करते,तब देवी को गर्भगृह से बाहर निकालकर विशेष स्थान पर रखा जाता। देवी केवल तीन माह तक बाहर रहतीं और फिर पुनः गर्भगृह में प्रतिष्ठित होतीं। मां डौन्डियों भगवती को महाकाली का स्वरूप माना जाता है। इनके साथ घण्डियाल,हीत,भैरव,नौ नरसिंह और चौसठ बयाल भी माने जाते हैं। बलि प्रथा का अंत और आधुनिक दौर-साल 2005 में तत्कालीन ग्राम प्रधान स्व.सुदामा सिंह गुसाई के प्रयासों और शासन के आदेश के बाद यहां पशुबलि की परंपरा पूर्ण रूप से समाप्त कर दी गई। इसके बाद से मंदिर की देखरेख महाकाली मंदिर समिति द्वारा की जा रही है। जनसहयोग से समिति ने मंदिर का पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार कार्य भी सम्पन्न किया है। नवरात्र पर्व और सांस्कृतिक धरोहर-नवरात्र पर्व पर यहां विशेष पूजा-अर्चना,हवन और अखंड ज्योति प्रज्वलन का आयोजन होता है। अष्टमी के दिन देवी का शुद्धिकरण कर उन्हें पुनः गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया जाता है। इस अवसर पर दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर परिसर और आसपास के गांवों में इन दिनों ढोल-दमाऊं की थाप,लोकगीतों की गूंज और झोड़ा-चांचरी नृत्य की छटा देखने को मिलती है। नवरात्र पर लगने वाले धार्मिक मेले में स्थानीय उत्पादों,पारंपरिक खानपान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की झलक भी देखने को मिलती है। स्थानीय जनभागीदारी और पर्यटन की संभावनाएं-इस मंदिर के संरक्षण और विकास में ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिलती है। ग्रामीण न केवल आर्थिक सहयोग देते हैं,बल्कि श्रमदान की परंपरा से मंदिर परिसर की स्वच्छता और प्रबंधन में भी योगदान करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार और पर्यटन विभाग इस क्षेत्र की धार्मिक पर्यटन योजनाओं में इसे शामिल करे तो यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों का आगमन संभव है। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे और पारंपरिक संस्कृति को भी नया संबल मिलेगा। आस्था और पहचान का केंद्र-मां डौन्डियों भगवती मंदिर न केवल उपासना का स्थान है,बल्कि यह गढ़वाल की उस जीवंत सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है,जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोक परंपराओं और आस्था को संरक्षित करती आई है। पर्यटन सर्किट की दिशा में पहल-शिक्षक जसपाल सिंह गुसाई के अनुसार स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों की साझा राय है कि यदि रुद्रप्रयाग,खिर्सू और पौड़ी को एक पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित किया जाए,तो डौन्डियों भगवती मंदिर जैसे आस्था केंद्र इस सर्किट के आकर्षण को और भी बढ़ा देंगे। इससे धार्मिक पर्यटन को नया आयाम मिलेगा और क्षेत्रीय विकास की राह खुलेगी।

Check Also
Close