शादी बनी हरियाली का उत्सव-समलौण पहल से पहाड़ों में जागी पर्यावरण चेतना

पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड के पहाड़ी अंचलों में एक अनूठी और प्रेरणादायी परंपरा तेजी से जनआंदोलन का रूप लेती जा रही है। समलौण पहल के तहत अब विवाह जैसे शुभ अवसर केवल पारंपरिक रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं रह गए हैं,बल्कि इन्हें पर्यावरण संरक्षण के संकल्प से भी जोड़ा जा रहा है। जनपद पौड़ी गढ़वाल और अल्मोड़ा के विभिन्न गांवों में आयोजित तीन अलग-अलग विवाह समारोहों में नवदंपतियों द्वारा फलदार पौधारोपण कर समाज को एक सशक्त संदेश दिया गया। जनपद पौड़ी गढ़वाल के विकास खंड पाबों की पट्टी बाली कण्डारस्यूं के ग्राम सैंजी में स्वर्गीय कुंदन सिंह साहू एवं दिन्ना देवी के पुत्र के विवाह उपरांत नवदंपति भूपेंद्र एवं मोनिका ने अपने आंगन में संतरे का समलौण पौधा रोपित किया। इस पहल के माध्यम से उन्होंने अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत प्रकृति के संरक्षण के संकल्प के साथ की। पौधे के संरक्षण की जिम्मेदारी भूपेंद्र की चाची सुमन देवी ने ली। कार्यक्रम का संचालन समलौण सेना की नायिका गीता देवी पोखरियाल ने करते हुए कहा कि बिगड़ते पर्यावरण को बचाने के लिए वृक्षारोपण को जनआंदोलन बनाना होगा। वहीं जनपद अल्मोड़ा के विकास खंड स्याल्दे के ग्राम गढ़कोट में भी एक विवाह समारोह के दौरान समलौण की यह अनूठी परंपरा देखने को मिली। राजे सिंह नेगी एवं कमला देवी की पुत्री के विवाह में वर-वधू यश एवं प्रिया ने संतरे का पौधा रोपकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। पौधे की जिम्मेदारी दुल्हन की मां कमला देवी ने ली। कार्यक्रम का संचालन समलौण आंदोलन के जिला संयोजक श्याम सिंह गुसाईं ने किया। उन्होंने कहा कि लगातार बढ़ती वनाग्नि और घटती हरियाली मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है,ऐसे में हर व्यक्ति को पौधारोपण और संरक्षण का संकल्प लेना होगा। इसी कड़ी में पौड़ी गढ़वाल के विकास खंड थलीसैंण की पट्टी कण्डारस्यूं के ग्राम धौलाण में भी एक विवाह समारोह में समलौण पहल को अपनाया गया। स्वर्गीय केशरी सिंह एवं गुड्डी देवी की पुत्री के विवाह में नवदंपति प्रमोद एवं लीला ने मौसमी का पौधा रोपकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया। कार्यक्रम का संचालन समलौण सेना की नायिका गुड्डी देवी ने किया। उन्होंने भावुक होकर कहा कि बेटी की विदाई के इस अवसर को यादगार बनाने के लिए यह पौधारोपण एक जीवंत स्मृति के रूप में हमेशा बना रहेगा। समलौण संस्था के पदाधिकारियों ने इस अवसर पर कहा कि यह पहल केवल पौधारोपण तक सीमित नहीं है,बल्कि यह हर संस्कार को प्रकृति से जोड़ने का एक प्रयास है। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा,बल्कि आने वाली पीढ़ियों में भी प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित होगी। तीनों ही आयोजनों में यह भी देखने को मिला कि पौधारोपण के इस पुण्य कार्य को प्रोत्साहित करने के लिए परिवारों द्वारा समलौण सेना को नगद पुरस्कार भी प्रदान किए गए,जो इस पहल के प्रति बढ़ते सामाजिक समर्थन का प्रतीक है। समलौण अब एक अभियान नहीं बल्कि पहाड़ की संस्कृति में रच-बस रही एक नई परंपरा बनती जा रही है-जहां हर खुशी के अवसर पर हरियाली का संकल्प लिया जा रहा है।
