प्रकृति पर विजय की लालसा-जब विकास की दौड़ कुदरत की मार बन गई

श्रीनगर गढ़वाल। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अगस्त्यमुनि रुद्रप्रयाग के राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ.दलीप सिंह बिष्ट ने कहा कि मानव सभ्यता का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि वह प्रकृति पर विजय पा सकती है,जबकि बार-बार प्रकृति ने हमें हमारी सीमाओं का एहसास कराया है। उन्होंने बताया कि अनियंत्रित औद्योगिकीकरण और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है,जिसके परिणामस्वरूप आज मानव स्वयं कुदरत की मार झेल रहा है। मानव सभ्यता का इतिहास प्रकृति के साथ संघर्ष और सामंजस्य दोनों से भरा पड़ा है। प्राचीन काल में मनुष्य ने नदियों,वनों,पर्वतों और आकाश को पूजनीय माना और अपने जीवन को उनके अनुरूप ढालने का प्रयास किया। लेकिन विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ ही मनुष्य में यह विश्वास जगा कि प्रकृति की शक्तियों को वह अपने नियंत्रण में ले सकता है। नदियों की दिशा मोड़ना, पर्वतों को चीरना,समुद्र किनारे शहर बसाना और आकाश को छूती इमारतें खड़ी करना इसी मानसिकता के उदाहरण हैं। डॉ.बिष्ट का कहना है कि यह लालसा,जो कभी सुविधा और सुरक्षा की भावना से उपजी थी,अब अनियंत्रित महत्वाकांक्षा और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का रूप ले चुकी है। परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन,बाढ़,भूस्खलन,चक्रवाती तूफान और जंगल की आग जैसी आपदाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। यह स्थिति हमें यह चेतावनी देती है कि प्रकृति पर विजय पाने की लालसा अंततः कुदरत की मार बनकर लौटती है,उन्होंने कहा औद्योगिक क्रांति के बाद से तकनीकी प्रगति ने मनुष्य को अपार शक्ति दी,लेकिन विवेक और संतुलन की भावना पीछे छूट गई। पहाड़ों को काटकर सुरंगें बनाना,नदियों को बांधकर बिजली पैदा करना,समुद्र में कृत्रिम द्वीप खड़े करना और जंगलों को समतल कर शहर बसाना इस अंधी दौड़ के प्रतीक हैं। इस दौड़ में न तो पारिस्थितिक तंत्र की नाजुकता का ख्याल रखा गया, न ही आने वाली पीढ़ियों की ज़रूरतों का। डॉ.बिष्ट ने कहा कि जोशीमठ में जमीन धंसने की त्रासदी,उत्तराखंड में बार-बार की बाढ़ें और देशभर में फैलता वायु प्रदूषण इसी अंधाधुंध विकास का परिणाम हैं। ये आपदाएं प्राकृतिक नहीं,बल्कि मानव-निर्मित हैं। उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति दोनों में तेजी से वृद्धि हो रही है। डॉ.बिष्ट ने आगे कहा कि अब यह स्वीकार करने का समय है कि प्रकृति को हराने का अर्थ अंततः स्वयं को हानि पहुंचाना है। सतत और सुरक्षित भविष्य के लिए आवश्यक है कि विकास योजनाओं में पारिस्थितिक सीमाओं का सम्मान किया जाए। उन्होंने सुझाव दिया कि स्थानीय समुदायों की पारंपरिक पर्यावरणीय समझ को नीति निर्धारण का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। जल,जंगल और जमीन के सतत उपयोग पर आधारित विकास मॉडल ही पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को केवल औपचारिक प्रक्रिया भर न रहने देकर,उसे कठोर,वैज्ञानिक और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए ताकि हर परियोजना के संभावित जोखिमों का समय रहते मूल्यांकन किया जा सके। डॉ.बिष्ट ने कहा कि सच्ची विजय का अर्थ प्रकृति को हराकर उस पर शासन करना नहीं,बल्कि उसके साथ सहअस्तित्व में रहना है। अनियंत्रित औद्योगिकीकरण,अंधाधुंध संसाधन दोहन और पारिस्थितिक सीमाओं की अनदेखी ने बार-बार यह साबित किया है कि कुदरत के नियम अटल हैं और उनसे टकराने की कीमत हमेशा भारी होती है। उन्होंने कहा कि बाढ़,भूस्खलन,जंगल की आग और समुद्री तूफान जैसी आपदाएं केवल प्राकृतिक नहीं,बल्कि हमारी विकास नीतियों की विफलता की कहानी कहती हैं। विकास की असली कसौटी यही है कि वह न केवल वर्तमान पीढ़ी की जरूरतें पूरी करे,बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी धरती को उतना ही सुरक्षित और जीवन-सक्षम छोड़े। लेखक डॉ.दलीप सिंह बिष्ट असिस्टेंट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष राजनीति विज्ञान विभाग राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अगस्त्यमुनि रुद्रप्रयाग के विचारों पर आधारित है।