गौमाता को मिले राष्ट्रमाता का सम्मान-गढ़वाल की देवभूमि से उठी आस्था,संस्कृति और अस्मिता की बुलंद आवाज

श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरा से एक बार फिर सनातन संस्कृति,आस्था और सामाजिक चेतना की सशक्त गूंज सुनाई दी है। जय शिव गोरखनाथ गढ़खालेश्वर महादेव के पावन सानिध्य में समाजसेवी एवं धर्मप्रेमी गढ़खालेश्वर धाम के महंत नरेश कुमार भारती द्वारा एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए मुख्यमंत्री उत्तराखंड को पत्र प्रेषित कर गौमाता को राष्ट्रमाता का दर्जा प्रदान करने की मांग की गई है। यह केवल एक मांग नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति,धर्म और परंपराओं के संरक्षण का एक व्यापक आह्वान है। पत्र में उल्लेख किया गया है कि गौमाता सनातन धर्म में केवल एक पशु नहीं,बल्कि मातृत्व,पोषण और श्रद्धा का जीवंत प्रतीक हैं। जन्म से लेकर जीवन के अंतिम संस्कार तक,गौ से प्राप्त दूध,दही,घी,गोबर और गोमूत्र का विशेष धार्मिक,सामाजिक और वैज्ञानिक महत्व रहा है। आस्था और परंपरा का आधार हिंदू धर्मग्रंथों में गौमाता को 33 करोड़ देवी-देवताओं का निवास स्थान माना गया है। प्रत्येक शुभ कार्य,पूजा-अर्चना और यज्ञ में गौ से संबंधित सामग्री का विशेष महत्व होता है। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं,बल्कि भारतीय जीवनशैली का अभिन्न अंग है,जो पर्यावरण संरक्षण और जैविक संतुलन का भी संदेश देती है। समाज और संस्कृति की रक्षा का संकल्प पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि आज के बदलते दौर में गौसंरक्षण केवल धार्मिक नहीं,बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी बन गई है। यदि गौमाता को राष्ट्रमाता का दर्जा मिलता है,तो इससे न केवल उनकी सुरक्षा सुनिश्चित होगी,बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी भारतीय संस्कृति और मूल्यों से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त होगा। सरकार से की गई भावनात्मक अपील नरेश कुमार भारती ने मुख्यमंत्री से भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि उत्तराखंड जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक प्रदेश में इस ऐतिहासिक निर्णय की शुरुआत होनी चाहिए,जिससे पूरे देश में एक सकारात्मक संदेश जाए और गौसंरक्षण को नई दिशा मिल सके। जनभावनाओं का उभार इस पहल को क्षेत्र के साधु-संतों,गौसेवकों और जागरूक नागरिकों का भी व्यापक समर्थन मिल रहा है। लोगों का मानना है कि यह केवल धार्मिक विषय नहीं,बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। गढ़वाल की यह पहल अब एक जनआंदोलन का रूप लेती दिखाई दे रही है,जो आने वाले समय में देशभर में एक नई बहस और जागरूकता को जन्म दे सकती है। गौमाता का सम्मान राष्ट्र का अभिमान इसी संदेश के साथ यह आवाज अब शासन-प्रशासन तक पहुंच चुकी है,देखना होगा कि इस पर क्या ऐतिहासिक निर्णय सामने आता है।
