रक्षाबंधन पर पेड़-पौधों को बांधा रक्षा सूत्र-100 समलौंण पौधों के रोपण के साथ लिया संरक्षण का संकल्प

कर्णप्रयाग/श्रीनगर गढ़वाल। रक्षाबंधन के पावन पर्व पर जहां भाई-बहन एक-दूसरे की रक्षा का संकल्प लेते हैं,वहीं जनपद चमोली के विकास खण्ड कर्णप्रयाग के ग्राम जयकण्डी में इस पर्व को प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा से जोड़ते हुए एक अनूठी पहल की गई। वन पंचायत भूमि पर समलौंण आंदोलन के तहत बांज,कचनार और आंवला प्रजाति के 100 समलौंण पौधों का रोपण किया गया। इसके बाद पौधों को रक्षा सूत्र बांधकर इनके संरक्षण एवं संवर्धन की सामूहिक जिम्मेदारी का संकल्प लिया गया। रक्षाबंधन के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम ने सामाजिक एवं धार्मिक परंपरा को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ते हुए एक प्रेरणादायी संदेश दिया। ग्रामीणों ने पौधों को केवल रोपित करने तक ही सीमित न रखते हुए उन्हें परिवार के सदस्य की तरह पालने-पोषने और सुरक्षित रखने का संकल्प लिया। रक्षा सूत्र बांधकर यह संदेश दिया गया कि जिस प्रकार भाई अपनी बहन की रक्षा का वचन देता है,उसी प्रकार मनुष्य का भी प्रकृति,जंगल और पेड़-पौधों की रक्षा करना नैतिक दायित्व है। कार्यक्रम का संचालन समलौंण आंदोलन की संयोजिका नन्दा देवी जोशी ने किया। उन्होंने कहा कि पेड़-पौधे मानव जीवन के आधार हैं और यही हमें प्राणवायु प्रदान करते हैं। यदि वनों और पर्यावरण का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित रखने के बजाय इसे प्रत्येक परिवार,गांव और समाज के संस्कारों से जोड़ना आवश्यक है। नन्दा देवी जोशी ने कहा कि समलौंण अपने आप में केवल पौधारोपण का कार्यक्रम नहीं,बल्कि प्रकृति के प्रति भावनात्मक जुड़ाव और सामाजिक जिम्मेदारी का आंदोलन है। जन्मदिन,विवाह,नामकरण,रक्षाबंधन,धार्मिक अनुष्ठान तथा अन्य संस्कारों के अवसर पर पौधारोपण की परंपरा विकसित कर पर्यावरण संरक्षण को जन-जन का संस्कार बनाया जा सकता है। इससे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी वर्गों में प्रकृति के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी की भावना पैदा होगी। उन्होंने कहा कि आज जयकण्डी की वन पंचायत भूमि पर लगाए गए 100 पौधे आने वाले समय में ग्रामीणों के सामूहिक प्रयासों से एक सघन समलौंण वन का रूप ले सकते हैं। इन पौधों की देखभाल और सुरक्षा करना ही इस अभियान की वास्तविक सफलता होगी। उन्होंने क्षेत्रवासियों से अपील की कि जंगलों को आग,अवैध कटान और अन्य नुकसान से बचाने के साथ-साथ प्रत्येक शुभ एवं मांगलिक अवसर पर कम से कम एक पौधा अवश्य रोपित करें और उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी लें। रक्षाबंधन के अवसर पर पेड़-पौधों को रक्षा सूत्र बांधने की पहल ने धार्मिक भावना को पर्यावरण संरक्षण के साथ जोड़ने का काम किया। इस अवसर पर ग्रामीणों ने संकल्प लिया कि लगाए गए पौधों को केवल सरकारी कार्यक्रम की औपचारिकता नहीं बनने दिया जाएगा,बल्कि उनकी नियमित देखभाल,सिंचाई और सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। कार्यक्रम में यह संदेश भी दिया गया कि धरती हमारी मां है,जंगल उसका श्रृंगार हैं और पेड़-पौधे हमारे जीवन के प्रहरी। जिस प्रकार रक्षाबंधन का रक्षा सूत्र रिश्तों को मजबूत करता है,उसी प्रकार पेड़ों को बांधा गया रक्षा सूत्र मानव और प्रकृति के बीच जिम्मेदारी और संवेदना के रिश्ते को मजबूत करने का प्रतीक है। समलौंण आंदोलन की इस पहल से ग्रामीणों में पर्यावरण संरक्षण को लेकर उत्साह देखने को मिला। ग्रामीणों ने कहा कि पहाड़ की संस्कृति और प्रकृति एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसलिए लोक परंपराओं,धार्मिक संस्कारों और सामाजिक आयोजनों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ना समय की आवश्यकता है। इस अवसर पर वन पंचायत सरपंच ऋषि प्रसाद डिमरी,दीपक डिमरी,नवीन चंद जोशी,धर्म सिंह,नीलम बिष्ट,कविता देवी बिष्ट,सुलेखा देवी,देवंती रावत,लकी सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे। जयकण्डी में रक्षाबंधन पर पौधों को बांधा गया रक्षा सूत्र आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुंदर संदेश छोड़ गया-रक्षा केवल रिश्तों की नहीं,बल्कि उस प्रकृति की भी होनी चाहिए जिसके बिना मानव जीवन की कल्पना संभव नहीं।
