बस्ता रहित दिवस पर गढ़कवि देवेंद्र उनियाल ने जगाई लोकभाषा की अलख-लोकभाषा बचेगी तभी लोकसंस्कृति बचेगी

श्रीनगर गढ़वाल। किताबों और बस्ते के बोझ से एक दिन के लिए मुक्त होकर जब पहाड़ की नई पीढ़ी अपनी ही मिट्टी की भाषा,संस्कृति और लोकजीवन से रूबरू हुई तो विद्यालय का वातावरण ज्ञान के साथ-साथ अपनी जड़ों की सुगंध से भी सराबोर हो उठा। बस्ता रहित दिवस पर कारगिल शहीद कुलदीप सिंह राजकीय इंटर कॉलेज खण्डाह विकासखंड खिर्सू में आयोजित कार्यक्रम विद्यार्थियों के लिए कक्षा की चारदीवारी से बाहर सीखने का ऐसा अवसर बना,जहां उन्हें अपनी लोकभाषा और लोक-संस्कृति की समृद्ध विरासत को समझने का मौका मिला। कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध गढ़कवि एवं साहित्यकार देवेंद्र उनियाल ने विद्यार्थियों से संवाद करते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा लोकभाषा के विविध आयामों पर सारगर्भित व्याख्यान दिया। उन्होंने विद्यार्थियों को अपनी जड़ों,अपनी बोली और अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रहने का संदेश देते हुए कहा कि लोकभाषा किसी क्षेत्र विशेष के संवाद का माध्यम मात्र नहीं होती,बल्कि वह उस समाज के इतिहास,संस्कार,परंपराओं,लोकअनुभव और सामूहिक स्मृतियों को अपने भीतर संजोए रहती है। गढ़कवि देवेंद्र उनियाल ने कहा कि लोकभाषा हमारी संस्कृति,परंपरा और लोकजीवन की पहचान है। इसके संरक्षण और संवर्द्धन की जिम्मेदारी केवल साहित्यकारों या रचनाकारों तक सीमित नहीं हो सकती। समाज के प्रत्येक व्यक्ति और विशेष रूप से युवा पीढ़ी को अपनी भाषा के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे घर-परिवार और समाज में अपनी लोकभाषा के प्रयोग को बढ़ावा दें तथा अपनी बोली को हीन भावना से न देखें। उन्होंने कहा कि जिस समाज की अपनी भाषा जीवंत रहती है,उसकी सांस्कृतिक पहचान भी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। कार्यक्रम का सबसे आकर्षक और भावपूर्ण पक्ष उस समय देखने को मिला जब गढ़कवि देवेंद्र उनियाल ने अपनी चर्चित रचनाओं बोई और ढूग्गू का भावपूर्ण वाचन किया। उनकी रचनाओं में पहाड़ के लोकजीवन,संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों की झलक ने विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति के और करीब ला दिया। विद्यार्थियों ने उनकी रचनाओं का आनंद लेने के साथ ही गढ़वाली भाषा के औखाणों और लोकभाषा की विविध अभिव्यक्तियों को भी समझा। इस दौरान लोकभाषा के संरक्षण और संवर्द्धन में गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी के योगदान पर भी विस्तार से चर्चा की गई। विद्यालय के प्रवक्ता जसपाल सिंह बिष्ट ने नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों के माध्यम से कार्यक्रम को और अधिक रोचक एवं जीवंत बना दिया। गीतों के माध्यम से विद्यार्थियों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं,बल्कि समाज के इतिहास,जीवनशैली,भावनाओं और सांस्कृतिक चेतना के दस्तावेज भी हैं। इस अवसर पर गोविंद नथवान,हेम चंद्र ममगाईं,जसपाल सिंह बिष्ट एवं कुसुमलता थपलियाल ने भी लोकभाषा के महत्व तथा उसके संरक्षण और संवर्द्धन की आवश्यकता पर अपने विचार व्यक्त किए। विद्यालय के प्रधानाचार्य विक्रम सिंह नेगी ने गढ़कवि देवेंद्र उनियाल का स्वागत एवं अभिनंदन किया। उन्होंने लोकभाषा के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए उनके निरंतर प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि विद्यार्थियों को अपनी लोकभाषा और संस्कृति से जोड़ने वाले ऐसे कार्यक्रम विद्यालयों में लगातार आयोजित किए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं,बल्कि विद्यार्थियों को अपनी सामाजिक,सांस्कृतिक और स्थानीय जड़ों से जोड़ना भी है। कार्यक्रम का मंच संचालन वरिष्ठ शिक्षक महेश गिरि ने किया। बस्ता रहित दिवस का यह आयोजन विद्यार्थियों के लिए पुस्तकीय ज्ञान से इतर सीखने का महत्वपूर्ण अवसर साबित हुआ। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने जहां लोकभाषा के महत्व को समझा,वहीं लोकसाहित्य और लोकगीतों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक विरासत को करीब से जानने का अवसर भी प्राप्त किया। कार्यक्रम ने यह संदेश भी दिया कि नई शिक्षा नीति के दौर में स्थानीय ज्ञान,लोकभाषा,लोककला और सांस्कृतिक विरासत को शिक्षा से जोड़ना विद्यार्थियों के समग्र विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। आज जब नई पीढ़ी तेजी से डिजिटल माध्यमों और दूसरी भाषाओं की ओर बढ़ रही है,ऐसे समय में अपनी मातृभाषा और लोकभाषा के प्रति सम्मान पैदा करना समय की आवश्यकता है। विद्यालय में आयोजित यह कार्यक्रम इसी दिशा में एक सार्थक पहल के रूप में सामने आया। कार्यक्रम का मूल संदेश स्पष्ट रहा-भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं,बल्कि पीढ़ियों के बीच संस्कृति और संस्कारों को पहुंचाने वाली जीवंत कड़ी है। इसलिए लोकभाषा को बचाना वास्तव में अपनी पहचान,अपनी परंपरा और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को बचाना है। लोकभाषा बचेगी,तभी लोक-संस्कृति बचेगी। जय गढ़भूमि,जय लोकभाषा।
