दिल्ली विश्वविद्यालय की शोध टीम ने उधमसिंह नगर की ऐतिहासिक रामलीलाओं का किया गहन अध्ययन*

गदरपुर । दिल्ली विश्वविद्यालय की शोध टीम,इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च के रिसर्च प्रोग्राम के अंतर्गत, उधमसिंह नगर जिले के रुद्रपुर, गदरपुर और दिनेशपुर की पुरानी और चर्चित रामलीला समितियों का सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक अध्ययन कर रही है। यह अध्ययन प्रोफेसर पुनीता गुप्ता के निदेशन में रिसर्च एसोसिएट डॉ.चंद्रशेखर बधानी एवं फील्ड इन्वेस्टिगेटर इन्द्रजीत सिंह बिष्ट द्वारा सम्पन्न किया जा रहा है। शोधकर्ताओं ने इन क्षेत्रों की रामलीला आयोजनों की ऐतिहासिकता,मंचनशैली और सामाजिक महत्व को समझने के लिए विभिन्न समितियों के पदाधिकारियों से संवाद किया। रुद्रपुर में श्री आशीष ग्रोवर,श्री गौरव राज बेहड़ और श्री जगदीश जग्गी,गदरपुर में श्री संजीव नागपाल,श्री जयकिशन अरोड़ा,श्री रविन्द्र बजाज,श्री अशोक धीर,श्री अंकुर चावला और दिनेशपुर में श्री अशोक कालड़ा,श्री मन्नी बाठला से मिलकर रामलीला की विभिन्न पारंपरिक पहुलओं,मंच संचालन,
महिला सहभागिता,लोकगीत, नृत्य और दृश्य प्रभावों की सूक्ष्म जानकारी जुटाई गई। गदरपुर की शिव मंदिर रामलीला कमेटी में महिलाओं की मंच संचालन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में सक्रिय भागीदारी दर्शनीय है। मंचन से पूर्व प्रतिदिन राष्ट्रगान का आयोजन,देशभक्ति की अनूठी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है। विगत 21 वर्षों से रावण की भूमिका निभा रहे संजीव नागपाल ने बताया कि संवादों में ‘रावण संहिता’ के प्रसंगों को विशेष रूप से शामिल किया जाता है,जिससे भूमिका में गहराई आ सके। गदरपुर की सबसे प्राचीन श्री रामलीला कमेटी अनाज मंडी के पदाधिकारी इस पर खुशी जाहिर करते हैं कि इस संस्कृति को वहां की नई पीढ़ी भी धरोहर के रूप में सहेज रही है,जिसे आज़ादी के बाद पाकिस्तान से आए सनातनी परिवारों ने स्थापित किया था।
शोध टीम ने पाया कि इन सभी रामलीलाओं में स्थानीय समुदाय, महिलाओं एवं युवाओं की भागीदारी अत्यंत उत्साहजनक है। संस्था ने उत्तराखंड के 10 जनपदों में रामलीलाओं का अध्ययन कर महत्वपूर्ण तथ्य एवं सांस्कृतिक पक्ष संकलित किए हैं। डॉ.चंद्रशेखर बधानी ने इस सहयोग के लिए सभी का आभार व्यक्त करते हुए बताया कि इसके बाद टीम काशीपुर और खटीमा के बाद बागेश्वर जनपद में शोध यात्रा के लिए प्रस्थान करेगी। इस अध्ययन से क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत,सामाजिक सहभागिता और परंपराओं के संरक्षण को नई दिशा मिलेगी।