त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के दो माह बाद भी ग्राम प्रधान अधिकारों से वंचित

श्रीनगर गढ़वाल। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव 2025 के नतीजे घोषित हुए पूरे दो माह बीत चुके हैं,लेकिन नवनिर्वाचित ग्राम प्रधान अब तक अपने अधिकारों से वंचित हैं। परिणाम घोषित होते ही जिला पंचायत एवं क्षेत्र पंचायत सदस्यों का शपथ-ग्रहण बड़े ही उत्साह और तत्परता से सम्पन्न हो गया था,किंतु ग्राम प्रधानों को अधिकार न सौंपना सरकार की गंभीर लापरवाही के रूप में देखा जा रहा है। ग्राम प्रधानों ने कहा सरकार की इस चुप्पी ने पंचायत व्यवस्था को बंधक बनाकर रख दिया है। पंचायतें आज भी प्रशासकों के भरोसे चल रही हैं। नवनिर्वाचित प्रधानों का कहना है कि यह स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ खुला मजाक है। पिछले महीनों की आपदाओं में गांवों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। सड़कों पर गहरे गड्ढे और टूटे रास्ते आज भी ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। नालियां जाम हैं,पेयजल योजनाएं अधर में लटकी हैं और पंचायत स्तर की बैठके एक वर्ष से ठप पड़ी हैं। इसका सीधा असर समाज कल्याण योजनाओं पर पड़ा है वृद्धावस्था पेंशन,विधवा पेंशन और विकलांग पेंशन जैसी सुविधाएं ग्रामीणों तक नहीं पहुंच पा रही हैं। मूल प्रमाणपत्र और अन्य आवश्यक दस्तावेजों के लिए ग्रामीण बार-बार ब्लॉक कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं,लेकिन प्रशासक तक सीधी पहुंच न होने से वे निराश लौट रहे हैं। प्रधानों का सवाल है जब चुनावी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है,तो वार्ड सदस्यों की अधिसूचना जारी करने में आखिर इतनी देर क्यों की जा रही है। उनका आरोप है कि यह देरी न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर कर रही है बल्कि गांवों के विकास को भी बुरी तरह बाधित कर रही है। ग्राम पंचायत सुरालगांव के प्रधान रुकम सिंह रावत ने कहा ग्राम पंचायत लोकतंत्र का सबसे मजबूत आधार है। यदि ग्राम पंचायतों को ही अधिकार विहीन रखा जाएगा,तो गांव का विकास कैसे संभव हो पाएगा,सरकार को तुरंत अधिकार सौंपने होंगे,तभी पंचायतें सुचारु रूप से चल पाएंगी। प्रधानों ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि 15 दिन के भीतर पंचायतों का गठन कर ग्राम प्रधानों को अधिकार नहीं सौंपे गए,तो वे मजबूरन अपने जीत के प्रमाण-पत्र जिला प्रशासन को लौटाने का कठोर कदम उठाएंगे। अब सबकी निगाहें सरकार पर टिकी हैं कि वह कब तक ग्राम प्रधानों को अधिकार सौंपती है और विकास कार्यों को गति देती है।