मां भगवती की महिमा से आलोकित हुआ सरणा-धर्म-संस्कृति की रक्षा का दिया संदेश-ध्याणियों के सम्मान से भावविभोर हुआ कथा पंडाल

श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की पुण्य एवं आध्यात्मिक धरा गौलक्ष्य पर्वत तथा इंद्रगवन की पावन तलहटी में स्थित ग्राम सरणा में आयोजित श्रीमद् देवी भागवत महापुराण कथा के सातवें दिवसीय आयोजन में श्रद्धा,भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा स्थल पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी और पूरा क्षेत्र मां भगवती के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। व्यासपीठ पर विराजमान विद्वान आचार्य पंडित प्रमोद चमोली ने मां आदिशक्ति की महिमा का भावपूर्ण वर्णन करते हुए बताया कि जब-जब संसार में अधर्म बढ़ता है और भक्तों पर संकट आता है,तब-तब मां भगवती विभिन्न स्वरूपों में अवतरित होकर अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। उन्होंने कहा कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से माता का ध्यान,भजन और आराधना करता है, उस पर मां सदैव अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखती हैं। मां को किसी भी भाव से स्मरण किया जाए,वह अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनती हैं और उनका कल्याण करती हैं। कथा के दौरान राजा हरिश्चंद्र के प्रेरणादायी प्रसंग का वर्णन करते हुए आचार्य चमोली ने कहा कि सत्य,धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियों से क्यों न गुजरे,अंततः उसकी विजय निश्चित होती है। उन्होंने कहा कि जीवन में कभी भी अपने धर्म,संस्कृति और संस्कारों का त्याग नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति अपनी जड़ों से कट जाता है,उसका वास्तविक कल्याण संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि इस महायज्ञ का मूल उद्देश्य समाज में धर्म,संस्कृति,सामाजिक समरसता और पारस्परिक एकता को सुदृढ़ करना है,जिससे आने वाली पीढ़ियां अपनी गौरवशाली परंपराओं से जुड़ी रहें। सातवें दिवस की कथा में एक अत्यंत भावुक और प्रेरणादायी क्षण उस समय देखने को मिला जब व्यासपीठ से मायके की शान-ध्याणियां विषय पर विशेष सम्मान कार्यक्रम आयोजित किया गया। आचार्य पंडित प्रमोद चमोली ने कहा कि बेटियां केवल परिवार की नहीं बल्कि पूरे समाज की गरिमा और संस्कृति की वाहक होती हैं। ध्याणियों का सम्मान करना स्वयं मां भगवती का सम्मान और उनकी पूजा के समान है। इस अवसर पर उपस्थित ध्याणियों को सम्मानित कर उनके प्रति समाज के सम्मान और स्नेह को व्यक्त किया गया। कथा स्थल पर वैदिक मंत्रोच्चार,देवी स्तुति एवं भजनों के बीच वातावरण पूरी तरह भक्तिमय बना रहा। यज्ञ के यजमानों की विशेष पूजा-अर्चना संपन्न कराई गई। वहीं पारंपरिक पहाड़ी वाद्य यंत्र ढोल-दमाऊं की मंगलमयी धुनों के साथ देव आह्वान किया गया। मान्यता के अनुसार देवताओं के आगमन का आशीर्वाद प्राप्त होने पर उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। देवधुनों और धार्मिक अनुष्ठानों ने पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर कर दिया। इस अवसर पर सुधीर जोशी,विनीत पोस्ती,मेडिकल कॉलेज श्रीनगर के जनसंपर्क अधिकारी अरुण बडोनी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। साथ ही आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामवासी,प्रवासी जन,ध्याणियां एवं श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए पहुंचे और धर्मलाभ प्राप्त किया। संपूर्ण आयोजन में विद्वान आचार्यों एवं पंडितों की गरिमामयी उपस्थिति रही। कथा के सातवें दिवस पर श्रद्धा,भक्ति,संस्कृति और सामाजिक समरसता का जो अनुपम संगम देखने को मिला,उसने सरणा गांव को एक बार फिर आध्यात्मिक चेतना के केंद्र के रूप में स्थापित कर दिया। मां भगवती की कृपा से पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा और श्रद्धालुओं ने धर्म एवं संस्कृति की रक्षा का संकल्प दोहराया।
