तीन माह से मानदेय ठप-स्वास्थ्य मिशन के 5000 कर्मचारी आर्थिक संकट में,आंदोलन की चेतावनी

श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के संविदा कर्मचारियों को पिछले तीन महीनों से मानदेय न मिलने के कारण गहरा आर्थिक संकट झेलना पड़ रहा है। फरवरी माह से वेतन भुगतान न होने के चलते कर्मचारियों के सामने रोजमर्रा के खर्चों से लेकर पारिवारिक दायित्वों तक की गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। स्थिति की विडंबना यह है कि मार्च और अप्रैल जैसे महीनों में,जब बच्चों के प्रवेश,शिक्षा और अन्य आवश्यकताओं पर खर्च का दबाव अधिक होता है,उसी समय कर्मचारियों को मानदेय से वंचित रहना पड़ा। इससे उनकी आर्थिक स्थिति और अधिक दयनीय हो गई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन संविदा कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष ने इस गंभीर मुद्दे पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान कर्मचारियों को लगातार समय पर मानदेय नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने बताया कि मिशन निदेशक से कई बार अनुरोध किया गया कि कर्मचारियों के लिए अलग से निधि की व्यवस्था कर नियमित और समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित किया जाए,लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि एक ओर कर्मचारियों पर अवकाश के दिनों में भी कार्य करने का दबाव बनाया जा रहा है,वहीं दूसरी ओर उनके मानदेय के भुगतान को लेकर लापरवाही बरती जा रही है। यह स्थिति कर्मचारियों के आर्थिक ही नहीं,बल्कि मानसिक उत्पीड़न का भी कारण बन रही है। संघ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही कर्मचारियों का बकाया मानदेय जारी नहीं किया गया और भविष्य में समय पर भुगतान की स्थायी व्यवस्था नहीं बनाई गई,तो कर्मचारी आंदोलन का रास्ता अपनाने को बाध्य होंगे,जिसकी पूर्ण जिम्मेदारी मिशन प्रबंधन की होगी। गौरतलब है कि प्रदेशभर में लगभग 5000 संविदा कर्मचारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत कार्यरत हैं,जिनमें चिकित्सक,फार्मासिस्ट,एएनएम,प्रयोगशाला तकनीशियन,प्रबंधक,लेखा प्रबंधक,परामर्शदाता तथा डाटा प्रविष्टि ऑपरेटर शामिल हैं। ये सभी कर्मचारी स्वास्थ्य सेवाओं को सुचारु रूप से संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं,लेकिन स्वयं अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब स्वास्थ्य व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले कर्मियों को ही समय पर उनका मानदेय नहीं मिल रहा,तो व्यवस्था की प्राथमिकताएं आखिर क्या हैं।
