टीईटी-2 की बाध्यता पर भड़के वरिष्ठ शिक्षक-अखिलेश चन्द्र चमोला ने शिक्षा मंत्री से मांगा हस्तक्षेप

श्रीनगर गढ़वाल। माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था में कार्यरत सेवारत शिक्षकों पर शिक्षक पात्रता परीक्षा द्वितीय (टीईटी-2) की अनिवार्यता लागू किए जाने की चर्चाओं ने शिक्षक समुदाय के बीच असंतोष और चिंता को गहरा कर दिया है। गुणवत्ता संवर्धन के नाम पर वर्षों से सेवाएं दे रहे माध्यमिक शिक्षकों के लिए नई पात्रता परीक्षा की बाध्यता को वरिष्ठ शिक्षक अखिलेश चन्द्र चमोला ने अव्यावहारिक,औचित्यहीन और शिक्षकों के अनुभव एवं सेवा शर्तों की भावना के विपरीत बताया है। राजकीय इंटर कॉलेज सुमाड़ी विकास खण्ड खिर्सू के वरिष्ठ हिन्दी सहायक अध्यापक अखिलेश चन्द्र चमोला ने इस मामले में शिक्षा मंत्री का ध्यान आकृष्ट करते हुए स्पष्ट कहा कि माध्यमिक स्तर पर पहले से विधिवत चयनित एवं नियुक्त शिक्षकों को वर्षों की सेवा के बाद पुनः पात्रता परीक्षा की कसौटी पर खड़ा करना न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने शिक्षा मंत्री से इस पूरे प्रकरण में तत्काल हस्तक्षेप करते हुए माध्यमिक संवर्ग के सेवारत शिक्षकों को टीईटी-2 की अनिवार्यता से मुक्त रखने के लिए स्पष्ट एवं ठोस नीतिगत निर्णय लेने की मांग की है। वरिष्ठ शिक्षक चमोला ने कहा कि माध्यमिक शिक्षा में नियुक्त शिक्षक किसी सामान्य प्रक्रिया से सेवा में नहीं आए हैं। शिक्षकों का चयन निर्धारित शैक्षिक एवं व्यावसायिक योग्यताओं,प्रतियोगी परीक्षाओं तथा विभागीय चयन प्रक्रिया के विभिन्न चरणों से गुजरने के बाद हुआ है। अनेक शिक्षक वर्षों से दुर्गम एवं विषम भौगोलिक परिस्थितियों में अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए हजारों विद्यार्थियों के भविष्य को संवारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिन शिक्षकों ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष विद्यालयों और विद्यार्थियों के लिए समर्पित कर दिए,उनके अनुभव,दक्षता और पूर्व निर्धारित नियुक्ति शर्तों को नजरअंदाज कर नई पात्रता परीक्षा की अनिवार्यता लागू करना शिक्षकों के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की प्रकृति अलग-अलग
चमोला ने कहा कि प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा के उद्देश्य,विषय-वस्तु,शिक्षण पद्धति और विषय-विशेषज्ञता में स्पष्ट अंतर है। माध्यमिक स्तर पर शिक्षक अपने-अपने विषय के विशेषज्ञ के रूप में विद्यार्थियों को उच्च कक्षाओं की शिक्षा प्रदान करते हैं। ऐसे में माध्यमिक संवर्ग के वर्षों से सेवारत विषय-विशेषज्ञ शिक्षकों पर प्राथमिक स्तर की पात्रता से संबंधित प्रावधानों को समान रूप से लागू करना व्यावहारिक दृष्टि से भी विचारणीय विषय है। उन्होंने कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता केवल किसी पात्रता परीक्षा से सुनिश्चित नहीं होती। इसके लिए विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक,विषय-विशेषज्ञों की उपलब्धता,आधुनिक शिक्षण संसाधन,प्रयोगशालाएं,पुस्तकालय,तकनीकी सुविधाएं,नियमित प्रशिक्षण और विद्यार्थियों के अनुकूल शैक्षिक वातावरण भी उतना ही आवश्यक है। वरिष्ठ शिक्षक ने कहा कि किसी शिक्षक की नियुक्ति जिस समय लागू वैध सेवा नियमों के अंतर्गत हुई है,उस समय निर्धारित अर्हताओं को पूरा करने के बाद उसने वर्षों तक अपनी सेवाएं दी हैं। ऐसे में बाद के वर्षों में नई अर्हता को अनिवार्य बनाकर उसे पूर्व से कार्यरत शिक्षकों पर लागू करना गंभीर नीतिगत प्रश्न खड़ा करता है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों की नियुक्ति के समय जो नियम और शर्तें प्रभावी थीं,उन्हीं के आधार पर उन्होंने अपने सेवाकाल और भविष्य की योजनाएं निर्धारित की। इसलिए किसी भी नई अर्हता को लागू करने से पहले उसके प्रभाव,कानूनी पक्ष और सेवारत शिक्षकों के हितों का व्यापक अध्ययन किया जाना आवश्यक है। चमोला ने कहा कि लगातार बदलते नियमों और नई-नई पात्रताओं की अनिवार्यता से पहले से कार्यरत शिक्षकों के बीच असुरक्षा एवं मानसिक दबाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव शिक्षण व्यवस्था पर भी पड़ने की आशंका है। उन्होंने कहा कि शिक्षक का मनोबल मजबूत होगा तो वह कक्षा में बेहतर परिणाम दे सकेगा। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में सुधार की नीतियां ऐसी होनी चाहिए जो शिक्षकों को सहयोग,सम्मान और संसाधन प्रदान करें,न कि वर्षों की सेवा के बाद उन्हें लगातार नई परीक्षाओं की चिंता में डालें। वरिष्ठ शिक्षक अखिलेश चन्द्र चमोला ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता में व्यापक सुधार चाहती है तो उसका ध्यान शिक्षकों की परीक्षा लेने के बजाय विद्यालयों की वास्तविक समस्याओं के समाधान पर होना चाहिए। उन्होंने विद्यालयों में पर्याप्त आधारभूत सुविधाएं,विषयवार शिक्षकों की उपलब्धता,रिक्त पदों पर नियुक्तियां,शिक्षकों की पदोन्नति,सेवा सुरक्षा,आधुनिक शिक्षण संसाधन,प्रयोगशालाओं का सुदृढ़ीकरण,पुस्तकालयों का विस्तार तथा दुर्गम क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षकों के लिए बेहतर सुविधाएं सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया। अखिलेश चन्द्र चमोला ने शिक्षा मंत्री से मांग की कि माध्यमिक संवर्ग के सेवारत शिक्षकों की परिस्थितियों और पूर्व निर्धारित सेवा नियमों को ध्यान में रखते हुए इस मामले में स्पष्ट नीति बनाई जाए। उन्होंने कहा कि वर्षों से सेवाएं दे रहे शिक्षकों के अनुभव और योगदान का सम्मान किया जाना चाहिए तथा टीईटी-2 की अनिवार्यता को लेकर उत्पन्न भ्रम की स्थिति को शीघ्र समाप्त किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षकों की मांग किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं,बल्कि सेवा शर्तों की स्पष्टता,शिक्षक सम्मान और स्थिर शैक्षिक वातावरण से जुड़ी हुई है। सरकार को शिक्षकों के साथ संवाद स्थापित कर उनकी आशंकाओं का समाधान करना चाहिए। अखिलेश चन्द्र चमोला ने कहा कि शिक्षक समाज अपनी जिम्मेदारियों से भली-भांति परिचित है और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में सदैव सरकार के साथ खड़ा रहा है। लेकिन यदि वर्षों से कार्यरत माध्यमिक शिक्षकों के अनुभव और सेवा अधिकारों की अनदेखी करते हुए उन पर नई पात्रता की बाध्यता थोपी जाती है,तो शिक्षक समाज लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से अपनी आवाज उठाने के लिए बाध्य होगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रदेश सरकार और शिक्षा विभाग इस संवेदनशील विषय पर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए सेवारत माध्यमिक शिक्षकों के हित में शीघ्र निर्णय लेंगे।
