Wednesday 18/ 02/ 2026 

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भारतीय ज्ञान परम्परा को पाठ्यक्रम से जोड़ने की ऐतिहासिक पहल


श्रीनगर गढ़वाल। उच्च शिक्षा में भारतीयता की बौद्धिक जड़ों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के चौरास परिसर स्थित शैक्षणिक क्रियाकलाप केंद्र में एमएमटीटीसी के तत्वावधान में पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परम्परा का एकीकरण विषय पर छह दिवसीय क्षमता निर्माण प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इस बहुप्रतीक्षित अकादमिक आयोजन में 95 से अधिक शिक्षक एवं शोधार्थी प्रतिभाग कर रहे हैं। कार्यक्रम का उद्देश्य उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में भारतीय ज्ञान परम्परा के दार्शनिक,सांस्कृतिक और वैज्ञानिक आयामों को सुव्यवस्थित रूप से समाहित करना है,ताकि भारतीय दृष्टि को वैश्विक अकादमिक विमर्श में समुचित स्थान मिल सके। उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान,नई दिल्ली के प्रो.आर.एल.नारायण सिन्हा यूजीसी पर्यवेक्षक के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने अपने ओजस्वी संबोधन में कहा भारतीय ज्ञान परम्परा केवल अतीत की धरोहर नहीं,बल्कि वैश्विक ज्ञान-विमर्श की आधारशिला है। यदि इसे समुचित रूप से पाठ्यक्रम में एकीकृत किया जाए,तो भारतीय शिक्षा व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान स्थापित कर सकती है। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो.एन.एस.पंवार ने भारतीय संस्कृति की उस समृद्ध परंपरा को रेखांकित किया,जिसने विश्व के ज्ञान-विज्ञान को दिशा दी। उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में भारतीय दृष्टिकोण का समावेश समय की आवश्यकता है। चौरास परिसर निदेशक प्रो.आर.एस.नेगी ने भारतीय ज्ञान परम्परा की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए इसे नैतिक और बौद्धिक संतुलन का आधार बताया। प्रो.राजेंद्र सिंह नेगी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रतिभागियों को शुभकामनाएं दीं। प्रो.अनिल नौटियाल ने कहा कि भारतीय शिक्षा और संस्कृति का वैश्विक प्रभाव सदियों से स्थापित रहा है,जिसे पुनः पाठ्यक्रमीय संरचना में सम्मानजनक स्थान दिया जाना चाहिए। कार्यक्रम समन्वयक डॉ.अमरजीत सिंह ने प्रशिक्षण की रूपरेखा एवं उद्देश्यों की विस्तार से जानकारी दी,जबकि एमएमटीटीसी के सह-निदेशक डॉ.राहुल कुंवर सिंह ने अतिथियों का स्वागत कर स्मृति-चिह्न एवं अंगवस्त्र भेंट किए। समापन में डॉ.सोमेश थपलियाल ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कुलपति प्रो.श्रीप्रकाश सिंह तथा एमएमटीटीसी के निदेशक प्रो.डी.एस.नेगी के मार्गदर्शन के लिए आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ.पुनीत वालिया एवं शोधार्थी सागर पुरी ने किया। कार्यक्रम के प्रथम दिवस में पांच सत्र आयोजित किए गए,जिनमें विषय की गहन वैचारिक समीक्षा की गई। श्रीदेव सुमन उत्तराखण्ड यूनिवर्सिटी की प्रो.कल्पना पंत ने भारतीय दर्शन की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए कहा कि भारतीय चिंतन परंपरा वेद,उपनिषद,दर्शन-शास्त्रों और लोकानुभव से निर्मित एक समन्वित बौद्धिक परंपरा है। उन्होंने न्याय,सांख्य,योग,मीमांसा और वेदांत को भारतीय ज्ञान प्रणाली की आधारशिला बताते हुए कहा कि ये परंपराएं सत्य की बहुआयामी खोज को स्वीकार करती हैं। वहीं Amity University के एसोसिएट प्रोफेसर एवं यूजीसी प्रशिक्षक डॉ.कुसाग्र ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को एक समग्र ज्ञान-संरचना बताते हुए कहा कि यह केवल दार्शनिक विमर्श तक सीमित नहीं,बल्कि शिक्षा,समाज,शासन,स्वास्थ्य और जीवन-व्यवहार से जुड़ी जीवंत परंपरा है। उन्होंने बल दिया कि समकालीन पाठ्यक्रम में इसे वैज्ञानिक दृष्टि और आलोचनात्मक चिंतन के साथ समाहित किया जाना चाहिए। यह छह दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम केवल प्रशिक्षण का मंच नहीं,बल्कि भारतीय ज्ञान परम्परा को पुनः अकादमिक केंद्र में स्थापित करने का एक गंभीर प्रयास है। यदि इस प्रकार के कार्यक्रम निरंतर संचालित होते रहे,तो निस्संदेह उच्च शिक्षा में भारतीय चिंतन की सशक्त उपस्थिति सुनिश्चित होगी और विश्वविद्यालयों में ज्ञान की भारतीय धारा नई ऊर्जा के साथ प्रवाहित होगी।

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