संस्कृत वर्णमाला की वैज्ञानिक संरचना में छिपा है ज्ञान-विज्ञान का वैश्विक सूत्र–प्रो.नेगी

श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा का एकीकरण विषय पर आयोजित छह दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम के तीसरे दिन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि पर गंभीर और सारगर्भित विमर्श हुआ। कार्यक्रम के दौरान गणित,ज्योतिष और रसायनशास्त्र जैसे विषयों के माध्यम से भारतीय परंपरा की तार्किकता और आधुनिक प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया। मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र के निदेशक प्रो.डी.एस.नेगी ने अतिथि वक्ताओं और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं,बल्कि वैज्ञानिक चिंतन की एक सुव्यवस्थित प्रणाली है। उन्होंने विशेष रूप से संस्कृत वर्णमाला की वैज्ञानिक संरचना का उल्लेख करते हुए कहा कि ध्वनियों का वर्गीकरण जिस क्रम और तर्क के आधार पर किया गया है,वह भाषाविज्ञान और ध्वनिविज्ञान की दृष्टि से अत्यंत परिपक्व और सुविचारित है। प्रो.नेगी ने यह भी उल्लेख किया कि विश्वप्रसिद्ध रसायनशास्त्री दिमित्री मेण्डलीफ द्वारा आवर्त सारणी के निर्माण और तत्वों के वर्गीकरण के दौरान जिन चुनौतियों का सामना किया गया,उनके समाधान की चर्चा में संस्कृत वर्णमाला की क्रमबद्ध एवं वैज्ञानिक संरचना से प्रेरणा लेने की बात अनेक विद्वानों द्वारा समय-समय पर कही जाती रही है। यह तथ्य भारतीय भाषिक परंपरा की वैज्ञानिकता और तार्किक गहराई को प्रमाणित करता है। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी परंपराओं को आधुनिक शिक्षा से जोड़ते हुए विद्यार्थियों को एक समग्र और संतुलित दृष्टिकोण प्रदान करें। कार्यक्रम के शैक्षणिक सत्रों को हिमाचल केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ.जितेंद्र कुमार तथा ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय के डॉ.अंकुश शर्मा ने संबोधित किया। वक्ताओं ने भारतीय गणितीय परंपरा,ज्योतिषीय गणना पद्धतियों और रसायन के प्राचीन सिद्धांतों के वैज्ञानिक आधार पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली अनुभव,प्रयोग और तर्क पर आधारित रही है,जिसे आज के पाठ्यक्रम में समुचित स्थान देकर विद्यार्थियों को बौद्धिक रूप से समृद्ध किया जा सकता है। इस अवसर पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पर्यवेक्षक प्रो.आर.एल.नारायण सिम्हा,कार्यक्रम समन्वयक डॉ.अमरजीत परिहार,डॉ.पुनीत वालिया सहित विभिन्न विभागों के प्राध्यापक और प्रतिभागी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ.मुस्कान कपूर एवं डॉ.अमिल कुमार ने प्रभावी ढंग से किया। तीसरे दिन का यह विमर्श इस बात का प्रमाण रहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत का गौरव नहीं,बल्कि वर्तमान और भविष्य की शैक्षणिक संरचना को दिशा देने वाली सशक्त आधारशिला है। विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित यह बौद्धिक संवाद शिक्षा जगत में एक नई चेतना का संचार करता दिखाई दिया।
